रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रत्येकं कर्षमात्रं स्यात्कुट्टितं क्वाथयेज्जलैः । चतुर्गुणं जलं दत्त्वा यावत्पादावशेषितम् ॥ ३९ ॥ अनेन त्रिदिनं भाव्यं पूर्वोक्तं मर्दितं रसम् । रुद्ध्वा तद्वालुकायन्त्रे क्षणं मृद्वग्निना पचेत् ॥ ४० ॥ मृतसञ्जीवनो नाम चास्य गुञ्जाचतुष्टयम् । दातव्यमनुपानेन चासाध्यमपि साधयेत् ॥ षट्प्रकारमतीसारं साध्यासाध्यं जयेद् ध्रुवम् ॥ ४१ ॥ पारा दो तोले, गंधक दो तोले, विष छः मासे, अभ्रकभस्म साढ़े चार तोले इन सब औषधियोंको एकत्र करके धतूरेके पत्तोंके रसमें एक प्रहरतक और सर्पाक्षीके रसमें एक प्रहर तक खरल करे । फिर इसमें धायके फूल १ तोला, अतीस १ तोला, नागरमोथा १ तोला, सोंठ १ तोला, जीरा १ तोला, सुगंधवाला १ तोला, अजवायन १ तोला, धनिया १ तोला, बेलगिरी १ तोला, पाठ एक तोला,हरड़ एक तोला, पीपल एक तोला, कुड़ेकी छाल एक तोला, इन्द्रजौ एक तोला, कैथ एक तोला और कच्चा अनार एक तोला लेकर उत्तम रीतिसे कूटकर सम्पूर्ण द्रव्योंसे चौगुने जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई जल बाकी रह जाये तब उतारकर छान लेवे; फिर इस क्वाथकी उपरोक्त औषधिमें तीन बार भावना देवे । फिर एक हांड़ीमें रखकर ऊपरसे एक छोटेसे सिकोरेके साथ हांड़ीके मध्यमें ही औष- धिको ढक देवे और उसकी संधियोंको अच्छे प्रकारसे बंद करके उसके ऊपर बालू भर देवे । पश्चात् मंद मंद अग्निसे दो घड़ी तक पकावे । फिर अपने आप शीतल होजाने पर औषधि निकाल लेवे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करनेसे असाध्य अतिसार भी नष्ट होजाता है । इससे साध्य और असाध्य छः प्रकारका अतिसार निश्चय ही दूर होजाता है । इसको मृतसंजीवन रस कहते हैं ॥ ३६-४१ ॥