रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विदध्यात् ॥ २८ ॥ एषाऽतिसारग्रहणीं ज्वराग्नि- मान्द्यं निहन्यात्कनकप्रभेयम् । दध्योदनं भोज्य- मनुष्णवारि मांसं भजेत्तित्तिरिलावकानाम्॥२९॥ काले धतूरेके बीज, कालीमिरच, सिंगरफ, पीपल, सुहागा, विष और गंधक यह सब औषधि सामन भाग लेकर भांगके पत्तोंके रसमें एक दिवस खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अतीसार, संग्रहणी, ज्वर और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसके सेवन करनेके अंतमें दही भात, शितल जल, तीतरका मांस और लवेका मांस इनका पथ्य देवे । इसको कनकप्रभा वटी कहते हैं ॥ २८॥२९॥ कारुण्यसागर रस । भस्मसूताद्धिधा गन्धं तथा द्वित्वं मृताभ्रकम् । दिनं सार्षपतैलेन पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् ॥ ३० ॥ रसैर्मार्गवमूलोत्थैः पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् । त्रिक्षारपञ्चलवणविषाव्योषाग्निजीरकैः ॥ ३१ ॥ सविडङ्गैस्तुल्यभागैरयं कारुण्यसागरः । माषमात्रं ददीतास्य भिषक् सर्वातिसारके ॥ ३२ ॥ सज्वरे विज्वरे वापि सशूले शोणितोद्भवे । निरामे शोथयुक्ते वा ग्रहण्यां सान्निपातिके । अनुपानं विनाप्येष कार्यसिद्धिं करिष्यति ॥३३॥ पारदभस्म या रससिन्दूर १ भाग, गंधक २ भाग और अभ्रकभस्म ४ भाग लेवे; इन सबको एकत्र करके एक दिनतक सरसोंके तेलमें खरल करे । फिर एक प्रहर वालुकायंत्रमें पकावे, फिर भांगरेके रसमें पीसकर वालुकायंत्र में एक प्रहरतक पकावे; तदनंतर सज्जी, जवाखार, सुहागा, विडनमक, सेंधानमक, समुद्रनमक, कालानमक, रोमक लवण, विष,