भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १८५ ) प्रत्येकके रसमें अलग अलग भावना देवे । फिर इसमें एक तोला कालीमिरचोंका चूर्ण और सुहागा छः मासे इन सबको मिलाकर रगड़े, फिर धूपमें सुखा लेवे और मटरके समान इसकी गोली बना लेवे । रोगीकी आयु, अग्नि और बलाबलका विचार कर यथायोग्य अनु- पानके साथ प्रयोग करनेसे खाँसी, क्षय, श्वास और वातकफजनित पीड़ा दूर होती है । वाजीकरणमें इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इससे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है, ज्वर और अती- साररोगकी यह सिद्ध औषधि है । रसायन कार्यमें इस औषधिसे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इस औषधिके भक्षण करनेसे भोजन और शयनादिका कुछ परिहार नहीं है । इसपर अवश्य दही भक्षण करना चाहिये । इस औषधिको नागार्जुन मुनिने कहा है। इसको अभ्रवाटिका कहते हैं ॥ १६-२५ ॥ कनकसुन्दर रस । हिंगुलं मरिचं गन्धं टंकणं पिप्पली विषम् । कनकस्य च बीजानि समांशं विजयाद्रवैः ॥ २६ ॥ मर्दयेद्याममात्रन्तु चणमात्रा वटी कृता । भक्षणाद्ग्रहणीं हन्ति रसः कनकसुन्दरः । अग्निमान्द्यं ज्वरं तीव्रमतिसारञ्च नाशयेत् ॥ २७ ॥ सिंग्रफ, कालीमिरच, गंधक, सुहागा, पीपल, विष और काले धतूरेके बीज यह सब औषधि समान भाग लेव; पश्चात् भांगके पत्तोंके रसमें एक प्रहर उत्तम रीतिसे खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके भक्षण करनेसे संग्रहणी, मंदाग्नि ज्वर और अतीसार रोग नष्ट होते हैं । इसको कनकसुन्दर रस कहते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥ कनकप्रभा । सुवर्णबीजं मरिचं मरालपादं कणा टंकणकं विषञ्च । गन्धं जयाद्भिर्दिवसं विमर्द्य गुञ्जाप्रमाणां वटिकां