रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १९६ ) एतत्प्रोक्तं कुमाराणां रक्षणाय महौषधम् । ज्वरघ्नं दीपनञ्चैव बलवर्णप्रसाधनम् ॥ २६ ॥ दुर्वारं ग्रहणीरोगं जयत्येव प्रवाहिकाम् । सूतिकाञ्च जयेदेतद्रक्ताशों रक्तसम्भवम् ॥ २७ ॥ पिशाचा दानवा दैत्या बालानां विघ्नकारकाः । यत्रौषधवरस्तिष्ठेत्तत्र सीमां न यांति ते ॥ २८ ॥ बालानां गदयुक्तानां स्त्रीणाञ्चैव विशेषतः । महागन्धकमेतद्धि सर्वव्याधिनिषूदनम् ॥ २९ ॥ यह बालकोंकी रक्षाके लिये उत्तम औषधि है। यह औषधि ज्वर- नाशक, अग्निप्रदीपक, बल और वर्णको बढ़ानेवाली तथा दुस्तर संग्र- हणी रोग, प्रवाहिका, सूतिकारोग, रक्तार्श और रक्तोत्पन्न रोगोंको नष्ट करती है। जिस स्थानमें यह औषधि स्थित रहती है वहां बाल- कोंके विघ्न करनेवाले पिशाच, दानव, दैत्य दूर भाग जाते हैं। यह रोगी बालक और स्त्रीजनोंको अतीव उपकारी है। इसको महागन्धक कहते हैं ॥ २६-२९ ॥ सर्वांगसुन्दर रस । विना पाकेन सर्वाङ्गसुन्दरोऽयं प्रकीर्त्तितः ॥ ग्रहण्यां ये रसाः प्रोक्तास्तेऽतीसारे प्रकीर्तिताः॥३०॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अतिसाररोगचिकित्सा । पूर्वोक्त महागन्धक पाकरहितको सर्वांगसुन्दर रस कहते हैं। केवल अन्तर इतना है कि महागन्धकका पाक किया जाता है और सर्वांग- सुन्दरका पाक नहीं किया जाता । संग्रहणीरोगमें जो रस कहे हैं वह अतीसार रोगमें भी प्रयुक्त करने चाहिये ॥ ३० ॥ इति अतिसाररोगचिकित्सा ।