रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । ( १९६ ) एतत्प्रोक्तं कुमाराणां रक्षणाय महौषधम् । ज्वरघ्नं दीपनञ्चैव बलवर्णप्रसाधनम् ॥ २६ ॥ दुर्वारं ग्रहणीरोगं जयत्येव प्रवाहिकाम् । सूतिकाञ्च जयेदेतद्रक्ताशों रक्तसम्भवम् ॥ २७ ॥ पिशाचा दानवा दैत्या बालानां विघ्नकारकाः । यत्रौषधवरस्तिष्ठेत्तत्र सीमां न यांति ते ॥ २८ ॥ बालानां गदयुक्तानां स्त्रीणाञ्चैव विशेषतः । महागन्धकमेतद्धि सर्वव्याधिनिषूदनम् ॥ २९ ॥ यह बालकोंकी रक्षाके लिये उत्तम औषधि है। यह औषधि ज्वर- नाशक, अग्निप्रदीपक, बल और वर्णको बढ़ानेवाली तथा दुस्तर संग्र- हणी रोग, प्रवाहिका, सूतिकारोग, रक्तार्श और रक्तोत्पन्न रोगोंको नष्ट करती है। जिस स्थानमें यह औषधि स्थित रहती है वहां बाल- कोंके विघ्न करनेवाले पिशाच, दानव, दैत्य दूर भाग जाते हैं। यह रोगी बालक और स्त्रीजनोंको अतीव उपकारी है। इसको महागन्धक कहते हैं ॥ २६-२९ ॥ सर्वांगसुन्दर रस । विना पाकेन सर्वाङ्गसुन्दरोऽयं प्रकीर्त्तितः ॥ ग्रहण्यां ये रसाः प्रोक्तास्तेऽतीसारे प्रकीर्तिताः॥३०॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अतिसाररोगचिकित्सा । पूर्वोक्त महागन्धक पाकरहितको सर्वांगसुन्दर रस कहते हैं। केवल अन्तर इतना है कि महागन्धकका पाक किया जाता है और सर्वांग- सुन्दरका पाक नहीं किया जाता । संग्रहणीरोगमें जो रस कहे हैं वह अतीसार रोगमें भी प्रयुक्त करने चाहिये ॥ ३० ॥ इति अतिसाररोगचिकित्सा ।
( १९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ ग्रहणीरोगचिकित्सा । जातीफलादिग्रहणीकपाट रस । जातीफलं टङ्कणमभ्रकञ्च धूस्तूरबीजं समभाग- चूर्णम् । भागद्वयं स्यादहिफेनकस्य गन्थालिका- पत्ररसेन मर्द्यम् ॥१॥ चणप्रमाणा वटिका विधेया यत्नाद्विदद्याद् ग्रहणीगदेषु । सामेषु रक्तेषु सशूल- केषु पक्वेष्वपक्वेषु गुदामयेषु ॥ २ ॥ रोगेषु दद्या- दनुपानभेदैर्मधुप्रयुक्तां ग्रहणीगदेषु । पथ्यं सद- ध्योदनमत्र देयं रसोत्तमोऽयं ग्रहणीकपाटः ॥ ३ ॥ जायफल, सुहागा, अभ्रकभस्म और धतूरेके बीज यह प्रत्येक एक एक भाग और अफीम २ भाग लेवे; इन सब औषधियोंको गन्धप्रसा- रणीके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके चनेकी बराबर गोलियां बना लेवे । इन गोलियोंका आमसंयुक्त, रुधिरसहित, शूलसमेत और पक्वा- पक्व ग्रहणी रोग तथा अर्शोरोगमें सेवन करना चाहिये । रोगीकी अव- स्थाको विचारकर अनुपानकी कल्पना करे । संग्रहणीरोगमें इस औष- धिका सहतके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेपर दहीके साथ भातका पथ्य देवे । इसको जातीफलादिग्रहणीकपाट रस कहते हैं ॥ १-३॥ ग्रहणीकपाट रस । टंकणक्षारगन्धाश्मरसं जातीफलं तथा । बिल्वं खदिरसारञ्च जीरकं श्वेतधूनकम् ॥ ४ ॥ कपिहस्तकबीजञ्च तथा चोरकपुष्पकम् । एषां शाणं समादाय श्लक्ष्णचूर्णञ्च कारयेत् ॥ ५ ॥
भाषाटीकासहित । ( १९७ ) बिल्वपत्रककार्पासफलं शालिञ्च दुग्धिका । शालिञ्च मूलं कुटजं तथा कञ्चटपत्रकम् ॥ ६ ॥ सर्वेषां स्वरसेनैव वटिकां कारयेद्भिषक् । रक्तिकैकप्रमाणेन खादयेद्दिवसत्रयम् ॥ ७ ॥ दधिमस्तु ततः पेयं पलमात्रप्रमाणतः । अपि योगशताक्रान्तां ग्रहणीमुद्धतां जयेत् ॥ ८ ॥ आमशूलं ज्वरं कासं श्वासञ्चैव प्रवाहिकाम् । रक्तस्रावकरं द्रव्यं कार्यं नैवात्र युक्तितः ॥ ९ ॥ कृष्णवार्त्ताकुमत्स्यञ्च दधि तक्रञ्च शस्यते । ज्ञात्वा वायोः कृतिं तत्र तैलं वारि प्रदापयेत् ॥ १० ॥ सुहागा, गन्धक, पारा, जायफल, बेलगिरी, खैरसार, जीरा, सफेद राल, कौंचके बीज और चोरहुली इन प्रत्येक औषधिको चार चार मासे लेवे, सबका बारीक चूर्ण कर लेवे। फिर इस चूर्णको बेलके पत्ते, कपासके फल, शालि धान, दुद्धी, शालिंचकी जड़, कुड़ेकी छाल और जलचौलाईके स्वरसमें अलग अलग खरलकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोलीके हिसाबसे तीन दिन तक खाये और ऊपरसे चार तोले दहीका पानी पीवे। जो ग्रहणीरोग सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे आरोग्य नहीं होता वह इससे अवश्य दूर होता है। तथा आमशूल, ज्वर, खांसी, श्वास और प्रवाहिका इन सब रोगोंको भी दूर करता है। इसपर रुधिरको स्रावण कराने- वाले द्रव्य त्याग देवे । तथा काला बैंगन, मछली, दही और तक्रका सेवन पथ्य है। पवनसे बचाकर तैल और जलादिकसे स्नान करनेकी व्यवस्था करे ॥ ४-१० ॥ जातीफलाद्या वटिका । अभ्रस्य सूतस्य च गन्धकस्य प्रत्येकशो माष-
( १९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । चतुष्टयं च। विधाय शुद्धोपलपात्रमध्ये सुकज्जलीं वैद्यवरः प्रयत्नात् ॥ ११ ॥ जातीफलं शाल्मलि- वेष्टमुस्तं सटंकणं सातिविषं सजीरम् । प्रत्येक- मेषां मरिचस्य शाणप्रमाणमेकं विषमाषकं च ॥ १२॥ विचूर्ण्य सर्वाण्यावलोड्य पश्चात् विभा- वयेत् पत्ररसैरमीषाम् । इन्द्राणिकेन्द्राशनकञ्च जम्बु जयन्तिका दाडिमकेशराजौ ॥ १३ ॥ अविद्धकर्णापि च भृंगराजो विभाव्य सम्यग्वटिका विधेया । कोलास्थिमानाथ बहुप्रकारं सामं निहन्यादनिलान् गदांश्च ॥ १४ ॥ कुर्याद्विशेषा- दनलप्रवृद्धिं कासञ्च पञ्चात्मकमम्लपित्तम् । इयं निहन्याद् ग्रहणीमसाध्यां मर्त्यस्य जीर्णग्रहणीं प्रवृद्धाम् ॥ १५॥ असारकत्वं त्वतिसारमुग्रं श्वासं तथा पाण्डुमरोचकञ्च । चिरोद्भवां संग्रहकोष्ठदुष्टिं जयेद्भृश योगशतैरसाध्याम् । अनेकसम्भावित- मर्त्यलोका नानाविधव्याधिपयोधिनौका ॥ १६ ॥ अभ्रकभस्म ४ मासे, शुद्ध पारा ४ मासे और गन्धक ४ मासे, इन सबको एकत्र कर शुद्ध पाषाणके पात्रमें पीसकर कज्जली बनावे । फिर इसमें जायफल, मोचरस, नागरमोथा, सुहागा, अतीस, जीरा और काली मिरच यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे तथा विष एक मासे मिलाकर सबको एकत्र पीसकर इन्द्रायन, भांग, जामुन, जयन्ती, अनार, कुकुरभांगरा, पाठ और भांगरा इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग भावना देकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे साम और निराम अनेक प्रकारका ग्रहणीरोग
भाषाटीकासहित । ( १९९ ) तथा वातरोग नष्ट होता है । यह औषधि अत्यन्त अग्निदीपक तथा पांच प्रकारकी खाँसी, अम्लपित्त, पुरानी और असाध्य ग्रहणी, असारकता, अतिसार, श्वास, पाण्डुरोग, अरुचि और कोष्ठबद्धतादि समस्त रोग नष्ट करती है । सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे जो रोग दूर नहीं होते वह इसके सेवन करनेसे निश्चय दूर होजाते हैं । मर्त्यलोकमें यह औषधि रोगरूपी समुद्रसे पार तरनेके लिये नौकाके समान है । इसको जातीफलाद्या वटिका कहते हैं ॥ ११-१६ ॥ पूर्णकला वटी । रसं गन्धं घनं लोहं धातुकीपुष्पबिल्वकम् । विषं कुटजबीजञ्च पाठाजीरकधान्यकम् ॥ १७ ॥ रसाञ्जनं टङ्कणञ्च शिलाजतु पलं तथा । अभ्रञ्च त्रिफलं ग्राह्यं प्रत्येकं तोलकत्रयम् ॥ १८ ॥ भेकपर्णी पञ्चमूली बलाकाञ्चटदाडिमम् । शृङ्गाटं केशरं जम्बू-दधिमस्तु-जयन्तिका ॥१९॥ केशराजं भृङ्गराजं प्रत्येकं तोलकद्वयम् । द्विमाषा वटिका कार्या तक्रेण परिसेविता ॥ २० ॥ इयं पूर्णकला नाम्नी ग्रहणीगदनाशिनी । शूलघ्नी दाहशमनी वह्निदा ज्वरनाशिनी ॥ भ्रमच्छर्दिच्छेदकरी संग्रहग्रहणीं जयेत् ॥ २१ ॥ पारा, गंधक, नागरमोथा, लोहभस्म, धायके फूल, बेलगिरी, विष, इन्द्रजौ, पाठ, जीरा, धनिया, रसौत, सुहागा और शिलाजीत यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, अभ्रकभस्म और त्रिफलेये प्रत्येक औषधि तीन तीन तोले, मण्डूकपर्णी ( ब्राह्मी ), पञ्चमूल, खिरेंटी, जलपी- पल, अनार, सिंघाड़े, नागकेशर, जामुन, दहीका तोड़, जयन्ती, कुकुर- भांगरा और जलभांगरा यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेवे । इन
( ३०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सबको एकत्र पीसकर दो दो मासेकी गोली बना लेवे। एक एक गोली तक्रके साथ सेवन करे। इस औषधिके सेवन करनेसे संग्र- हणी, शूल, दाह ज्वर, वमन, भ्रम और संग्रहणी प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं। यह अत्यन्त अग्निप्रदीपक है। इसको पूर्णकला वटी कहते हैं ॥ १७–२१ ॥ वज्रकपाट रस । पारदं गन्धकञ्चैव अहिफेनं समोचकम् । त्रिकटु त्रिफलं चैव सममेकत्र कारयेत् ॥ २२ ॥ भङ्गं भृङ्गद्रवैश्चैतद्भावयेच्च पुनः पुनः । रक्तित्रयं ततश्चास्य मधुना सह भक्षयेत् ॥ असाध्यां ग्रहणीं हन्ति रसो वज्रकपाटकः ॥ २३ ॥ पारा, गंधक, अफीम, मोचरस, त्रिकुटा और त्रिफला यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र खरल करके भांगके पत्तोंके रसमें और भांगरेके पत्तोंके रसमें सात सात भावना देवे । इस औषधिका तीन रत्ती परिमाण शहदके साथ सेवन करनेसे असाध्य भी ग्रहणीरोग दूर होता है। इसको वज्रकपाट रस कहते हैं ॥ २२ ॥ २३ ॥ जातीफल रस । पारदाभ्रकसिन्दूरं गन्धं जातीफलं समम् । कुटजस्य फलं चैव धूर्तबीजानि टङ्कणम् ॥ २४ ॥ व्योषं मुस्ताऽभया चैव चूतबीजं तथैव च । बिल्वं सर्जरसं चैव दाडिमीफलवल्कलम् ॥ २५ ॥ एतानि समभागानि निःक्षिपेत् खल्लमध्यतः । विजयास्वरसेनैव मर्दयेच्छ्लक्ष्णचूर्णितम् ॥ २६ ॥ गुञ्जाफलप्रमाणान्तु वटिकां कारयेद्भिषक् । एकां कुटज-मूल-त्वक्कषायेण प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥
भाषाटीकासहित । (२०१) आमातिसारं हरते कुरुते वह्निदीपनम् । मधुना बिल्वशुण्ठेन रक्तग्रहणिं जयेत् ॥ २८ ॥ शुण्ठीधान्यकयोगेन चातिसारं निहन्त्यसौ । जातीफलरसो ह्येष ग्रहणीगदनाशनः ॥२९ ॥ पारा, अभ्रकभस्म, स्वर्णसिन्दूर, गंधक, जायफल, इन्द्रजौ, धतूरेके बीज, सुहागा, त्रिकुटा, नागरमोथा, हरड़, आमकी गुठली, बेलगिरी, राल और अनारके फलकी छाल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर खरलमें डालकर भांगके रसकी भावना देकर खूब मर्दन करके एक एक रत्तीकी गोली बनावे । प्रतिदिन एक गोली कुड़ेकी जड़के क्वाथके साथ सेवन करे तो आमातिसारको दूर करती है । अग्निको दीपन करती है । शहद और बेलगिरीके साथ सेवन करनेसे रक्तग्रहणी रोग दूर होता है । सोंठ और धनियेके साथ सेवन करनेसे अतिसार रोग दूर होता है।यह जातीफलरस ग्रहणीरोगको दूर करताहै॥२४-२९॥ ग्रहणीगजेन्द्रवटिका । रस-गन्धक-लोहानि शंख-टङ्कण-रामठम् । शठीतालीशमुस्तानि धान्यजीरकसैन्धवम् ॥ ३० ॥ धातक्यतिविषा शुण्ठी गृहधूमो हरीतकी ॥ ३१ ॥ भल्लातकं तेजपत्रं जातीफललवंगकम् । त्वगेलावालुकं बिल्वं मेथी शक्राशनं समम् ॥ ३२ ॥ छागीदुग्धेन वटिका रसवैद्येन कारिता ॥ ३३ ॥ गहनानन्दनाथेन भाषितेयं रसायने । वटी गजेन्द्रसंज्ञेयं श्रीमता लोकरक्षणे ॥ ३४ ॥ ग्रहणीं विविधां हन्ति ज्वरातीसारनाशिनी । शूलगुल्माम्लपित्तानि कामलाञ्च हलीमकम् ॥३५॥
( २०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बलवर्णाग्निजननी सेविता च चिरायुषी । कंडूं कुष्ठं विसर्पञ्च गुदभ्रंशं क्रिमिं जयेत् ॥ ३६ ॥ माषद्वयां वटीं खादेच्छागीदुग्धानुपानतः । वयोऽग्निबलमावीक्ष्य युक्त्या वा त्रुटिवर्धनम्॥३७॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, शंखभस्म, सुहागा, हींग, कचूर, तालीश- पत्र, नागरमोथा, धनिया, जीरा, सेंधानमक, धायके फूल, अतीस, सोंठ, घरका धुँआसा, हरड़, भिलावे, तेजपात, जायफल, लौंग, दार- चीनी, इलायची, सुगंधवाला, बेलगिरी, मेथी और भांग इन सबको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसकर गोली बना लेवे । श्रीमद्गहनानन्दने रसायन अधिकारमें यह ग्रहणी गजेन्द्रवाटिका लोककी रक्षाके लिये कही है । यह अनेक प्रकारकी ग्रहणी, ज्वर, अतिसार, शूल, गुल्म, अम्लपित्त, कामला, हलीमक, कण्डू, कुष्ठ, वीसर्प, गुदभ्रंश और क्रिमिरोगको दूर करती है । यह गोली तोलमें दो दो मासेकी बनानी चाहिये और प्रतिदिन एक गोली बकरीके दूधके साथ सेवन करनी चाहिये । अथवा रोगीकी अवस्था, बल और अग्निको देखकर उपरोक्त दो मासेके अतिरिक्त कम अथवा ज्यादा मात्राका निरूपण करे । यह गोली बल और वर्णको बढ़ाती है तथा अवस्थाको स्थापित करती है ॥ ३०-३७ ॥ पीयूषवल्लीरस । सूतमभ्रं गन्धकञ्च तारं लौहं सटङ्कणम् । रसाञ्जनं माक्षिकञ्च शाणमेकं पृथक् पृथक् ॥ ३८ ॥ लवंगं चन्दनं मुस्तं पाठा जीरक-धान्यकम् । समङ्गाऽतिविषा लोध्रं कुटजेन्द्रयवं त्वचम् ॥३९॥ जातीफलं विश्वबिल्वं कनकं दाडिमीच्छदम् । समङ्गा धातकी कुष्ठं प्रत्येकं रससम्मितम् ॥४०॥
भाषाटीकासहित । ( २०३ ) भावयेत्सर्वमेकत्र केशराजरसैः पुनः । चणकाभा वटी कार्या छागीदुग्धेन पेषिता ॥ ४१ ॥ अनुपानं प्रदातव्यं दग्धबिल्वं समं गुडैः । हन्ति सर्वानतीसारान् ग्रहणीं चिरजामपि ॥ ४२ ॥ आमसम्पाचनो सम्यग् वह्निवृद्धिकरस्तथा । पीयूषवल्लीनामायं ग्रहणीरोगनाशनः ॥ ४३ ॥ पारा, अभ्रकभस्म, शुद्ध गंधक, रूपाभस्म, लोहाभस्म, सुहागा, रसौत और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेवे; लौंग, चन्दन, नागरमोथा, पाठ, जीरा, धनिया, वराहक्रान्ता, अतीस, लोध, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, दालचीनी, जायफल, सोंठ, बेलगिरी, नागकेशर, अनारके पत्ते, मंजीठ, धायके फूल और कूठ यह प्रत्येक औषधि पारेकी बराबर अर्थात् चार चार मासे लेवे; ( कितने एक वैद्य यहां आठ आठ मासे औषधि लेनी चाहिये ऐसा कहते हैं ) इन सबको एकत्रकर कुकुरभांगरेके रसमें भावना दे; पश्चात् बकरीके दूधमें पीसकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिका भुने हुए बेल और गुड़के साथ सेवन करे। यह औषधि सब प्रकारके अतीसार और बहुत दिनोंकी पुरानी संग्रहणी रोगको दूर करती है । यह ग्रहणीरोगको हरने- वाला, आमको पचानेवाला और अच्छे प्रकारसे अग्निको दीपन करने- वाला पीयूषवल्ली रस है ॥ ३८-४३ ॥ ग्रहणीशार्दूल रस । रस-गन्धकयोश्चापि कर्षमेकं सुशोधितम् । द्वयोः कज्जलिकां कृत्वा हाटकं षोडशांशतः ॥ ४४ ॥ लवङ्गं निम्बपत्रञ्च जातीकोषफले तथा । एतेषां कर्षचूर्णेन सूक्ष्मैलां सह मेलयेत् ॥ ४५ ॥
( २०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मुक्तागृहे च संस्थाप्य पुटपाकेन साधयेत् । पञ्चगुञ्जाप्रमाणेन प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ ४६ ॥ सूतिकां ग्रहणीरोगं हरत्येष सुनिश्चितः । अर्शोघ्नो दीपनश्चैव बलपुष्टिप्रदायकः ॥ ४७ ॥ कासश्वासातिसारघ्नो बलवीर्यकरः परः । दुर्वारं ग्रहणीरोगमामशूलञ्च नाशयेत् ॥ संसारलोकरक्षार्थं पुरा रुद्रेण भाषितः ॥ ४८ ॥ पारा और गंधक यह दोनों शोधित एक एक तोला लेवे, फिर इन दोनोंकी एकत्र कज्जली बनावे और इसमें सोलहवां भाग सोनेके- भस्म मिलावे तथा लौंग, नींबके पत्ते, जायफल, जावित्री और छोटी इलायची इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक तोला परिमाण लेवे । सबको एकत्र पीसकर एक सीपमें भर देवे और उसको अच्छेप्रका- रसे बंद करके पुटपाककी विधिसे पकावे । फिर इसमेंसे निकाल प्रति- दिन पांच रत्तीके हिसाबसे सेवन करे । इसके सेवन करनेसे सूतिका- रोग, संग्रहणीरोग, बवासीर, खाँसी, श्वास, अतिसार, दुस्तर ग्रहणी रोग और आमशूल नष्ट होते हैं तथा अग्नि अत्यंत दीपन होती है, बल, वीर्य और सत्त्वकी वृद्धि होती है । संसारकी रक्षाके लिये पूर्व कालमें श्रीमहादेवने यह रस कहा है ॥ ४४-४८ ॥ वैद्यनाथ वटी । रसस्य शाणं संगृह्य काञ्जिकेन तु शोधयेत् । चित्रकस्य रसेनापि त्रिफलायाश्च बुद्धिमान् ॥४९॥ रसाद्धं गन्धकं शुद्धं भृङ्गराजरसेन वा । द्वाभ्यां संमूर्च्छनं कृत्वा स्वरसैः शाणसम्मितैः॥५०॥ खल्लयेत्तु शिलाखण्डे क्रमशो वक्ष्यमाणजैः । निर्गुण्डीमधुकश्वेताकुठेरग्रीष्मसुन्दरैः ॥ ५१ ॥
भाषाटीकासहित । (२०५) भृङ्गाऽब्दकेशराजैश्च तथा चेन्द्राशनोत्कटैः । सर्पपाभां वटीं कृत्वा दद्यात्तां ग्रहणीगदे ॥ सामवातेऽग्निमांद्ये च ज्वरे प्लीहोदरेषु च ॥ ५२ ॥ वातश्लेष्मविकारेषु तथा श्लेष्मगदेषु च । अम्तक्रादिसेवाञ्च कुर्वीत स्वेच्छया बहु ॥ ५३ ॥ श्रीमता वैद्यनाथेन लोकानुग्रहकारिणा । स्वप्नान्ते ब्राह्मणस्येयं भाषिता लिखितेन तु ॥ ५४ ॥ पारा चार मासे लेकर कांजीमें शुद्ध करे, पश्चात् चित्रकके रसमें फिर त्रिफलेके रसमें भावना देकर शुद्ध करे और फिर पारेसे आधा भाग शुद्ध गंधक लेवे, फिर इन दोनोंको भांगरेके चार मासे रसमें खरल करके मूर्च्छित करे । फिर निर्गुण्डी, मुलैठी, अपराजिता, सफेद वनतुलसी, ग्रीष्मसुन्दर, भांगरा, नागरमोथा, कुकुरभांगरा और भांग इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग भावना देकर सरसोंकी बरा- बर गोली बनावे । इन गोलियोंका ग्रहणी रोग, आमवात, मंदाग्नि, ज्वर, प्लीहोदर, वातकफके रोग, कफके रोग और समस्त अग्निके रोगोंमें विधिपूर्वक सेवन करे । इसपर खटाई और तक्र यथेच्छानुसार सेवन करे । श्रीमान् वैद्यनाथने संसारके ऊपर अनुग्रह करके यह किसी ब्राह्मणको स्वप्नमें कही है और लिखित ऋषिने भाषण की है॥४९-५४॥ रसपर्पटिका । याम्लपित्ते विधातव्या गुटिका च क्षुधावती । तत्र प्रोक्तविधा शुद्धौ समानौ रसगन्धकौ ॥ ५५ ॥ संमर्द्य कज्जलाभन्तु कुर्यात्पात्रे दृढाश्रये । ततो बादरवह्निस्थे लौहपात्रे द्रवीकृतम् ॥ ५६ ॥ गोमयोपरि विन्यस्त-कदलीपत्रपातनात् । कुर्यात्पर्पटिकाकारमस्य रक्तिद्वयं क्रमात् ॥ ५७ ॥ ८
( २०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । द्वादशरक्तिकां यावत्प्रयोगः प्रहरार्द्धतः । तदूर्ध्वं बहुपूगस्य भक्षणं दिवसे पुनः ॥ ५८ ॥ अम्लपित्तरोगमें क्षुधावती गुटिकामें जो पारे और गंधकके शुद्ध करनेकी विधि कही है उसी विधिसे शुद्ध किये हुए समान भाग पारे और गंधकको लेकर दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली बना लेवे; फिर एक लोहेके पात्रमें बेरीके जलते हुए अंगारोंपर उस कज्ज- लीको स्थापित करे । पात्रमें थोड़ा घृत अवश्य लगाना चाहिये, नहीं तो यह कज्जली आगसे उड़ जायेगी और तैलके समान पतली कभी न होगी यह अनुभवकी बात है । पर्पटी बनाते समय आंच बहुत मन्दी होनी चाहिये; जब यह गल जाय तब गोबरके ऊपर एक केलेका पत्ता बिछाकर उसके ऊपर इसको डाल देवे और ऊपरसे एक केलेके पत्तेमें बँधी हुई गोबरकी पोटलीसे दबाकर पापड़ जैसी बना लेवे । इस प्रकारसे यह रसपर्पटिका सिद्ध होती है । इसे पहिले दिन दो रत्ती सेवन करे । फिर क्रमसे एक एक रत्ती बढ़ाता जाय, जब बढ़ते बढ़ते बारह दिन पूरे हो जावें तब फिर क्रमसे एक एक रत्ती घटाता जावे । आधे प्रहरके अनन्तर ऊपरसे बहुतसी सुपारी चर्वण करे ॥ ५६-५८॥ तृतीय एव मांसाज्यदुग्धाद्यत्र विधीयते । वर्ज्यं विदाहिस्त्रीरम्भामूलं तैलञ्च सार्षपम् ॥ ५९ ॥ कृष्णमत्स्याम्बुजखगांस्त्यक्त्वोन्निद्रः पयः पिबेत् । ग्रहणीक्षयकुष्ठार्शः-शोथाऽजीर्णविनाशिनी ॥ रसपर्पटिका ख्याता निबद्धा चक्रपाणिना ॥६०॥ तीसरे दिनसे मांस, रस, घृत और दूधका पथ्य दे । इस औषधिके सेवन करने पर दाहकारक पदार्थ, स्त्रीप्रसंग, केलेका कन्द, सरसोंका तेल, छोटी मछली, कच्छपादि और पक्षीका मांस त्याग देवे ।
भाषाटीकासहित । (२०७) दिनमें सोना भी त्याग देवे । इस औषधिका सेवन करनेवाला मनुष्य बार बार दूधको पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे संग्रहणी, क्षय, कोढ़, बवासीर, अर्श, शोथ और अजीर्ण रोग नष्ट होते हैं, इसको चक्र- पाणिदत्तने कहा है । इसको रसपर्पटिका कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥ विजयपर्पटी । हाटकं रजतं ताम्रं यद्यत्र पारदीयते । विजयाख्या तु सा ज्ञेया सर्वरोगनिषूदनी ॥ ६१ ॥ उपरोक्त रसपर्पटीमें यदि पारेकी बराबर सोना भस्म, रूपा भस्म और तांबा भस्म मिलाकर पूर्वोक्त विधिसे पर्पटी तैयार की जाय तो इसको विजयपर्पटी कहते हैं । यह विजयपर्पटी सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करती है ॥ ६१ ॥ स्वर्णपर्पटी । रसोत्तमं पलं शुद्धं हेम तोलकसंयुक्तम् । शिलायां मर्दयेत्तावद्यावदेकत्वमागतम् ॥ ६२ ॥ गन्धकस्य पलञ्चैकमयःपात्रे ततो दृढे । मर्दयेद्दृढपाणिभ्यां यावत्कज्जलतां व्रजेत् ॥ ६३ ॥ ततः पाकविधानज्ञः पर्पटीं कारयेत्सुधीः । रक्तिकादिक्रमेणैव योजयेदनुपानतः ॥ ग्रहणीं विविधां हन्ति वृष्या सर्वज्वरापहा ॥ ६४ ॥ सिंगरफसे निकाला हुआ पारा ४ तोले, सुवर्णभस्म ( कोई वैद्य सुव- र्णके वक डालते हैं ) १ तोला इन दोनोंको एकत्र खरल करे । पश्चात् इसमें चार तोले शुद्ध गंधक डालकर लोहेके पात्रमें खूब अच्छे प्रका- रसे खरल करे । जब कज्जलके समान होजावे तब रसपर्पटीके नियमा- नुसार पर्पटी तैयार करावे । प्रतिदिन एक एक रत्तीके नियमसे सेवन करे और यथादोषानुसार अनुपानकी कल्पना करे । यह औषधि स ।
( २०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रकारकी संग्रहणीको दूर करती है । ( इसके प्रयोगमें दूधके सिवाय और खाना पीना कुछ भी न करे, यह १२ रत्ती तक क्रमशः बढ़ानी और फिर एक एक रत्तीके ही हिसाबसे घटानी चाहिये । तृषा लगे तो मौसम्मी, अनार आदिका रस लेवे; यह बिल्वपत्रके स्वरसके साथ बहुत अच्छा काम करती है ) तथा वृष्य है और सर्व प्रकारके ज्वरके दूर करती है ॥ ६२-६४ ॥ पञ्चामृतपर्पटी । अष्टौ गन्धकमाषकारसदलं लौहं तदर्द्धं शुभं, लौहार्द्धञ्च वराभ्रकं सुविमलं ताम्रं तथाभ्राद्धिकम् । पात्रे लौहमये च मर्दनविधौ चूर्णीकृतञ्चैकतो, दाव्यों बादरवह्निनातिमृदुना पाकं विदित्वा दले ६५ रम्भाया लघु ढालयेत्पट्टारियं पञ्चामृतापर्पटी, ख्याता क्षौद्रघृतान्विता प्रतिदिनं गुञ्जाद्वयं वृद्धितः । लौहे मर्दनयोगतः सुविमलं भक्षक्रिया लौहवद्, गुञ्जाष्टावथवा त्रिकं त्रिगुणितं सप्ताहमेवं भजेत्॥६६॥ नानावर्णग्रहण्यामरुचिसमुदये दुष्टदुर्नामकादौ, छर्द्यां दीर्घातिसारे ज्वरभवकलिते रक्तपित्ते क्षयेऽपि । वृष्याणां वृष्यराज्ञी वलिपलितहरा नेत्ररोगैकहन्त्री, स्वस्थं दीप्तस्थिराग्निपुनरपिनवकं रोगिदेहं करोति ६७ गन्धक ८ मासे, शुद्ध पारा ४ मासे, लोहभस्म २ मासे और अभ्रकभस्म १ मासा और तांवाभस्म ४ रत्ती लेवे । फिर इन सबको एकत्र लोहेके पात्रमें खरल करके पीछे एक लोहेकी करछीमें इसको रखकर उस करछीको बेरीके अंगारों पर रखकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब यह अच्छे प्रकारसे गल जावे तब गोबरके ऊपर एक केलेका पत्ता रखकर उसके ऊपर इसको ढाल देवे और ऊपरसे एक
भाषाटीकासहित । ( ३०९ ) केलेके पत्तेमें गोबरकी पोटली बांध उससे पिघली हुई दवाको दबा- कर पपड़ीसी बना लेवे, इसको पञ्चामृत पर्पटी कहते हैं। इस पर्पटीका पहिले दिन शहद और घृतके साथ दो रत्ती परिमाण सेवन करे; फिर प्रतिदिन क्रम क्रमसे एक एक रत्ती बढाता जाय । जब आठ या नौ रत्ती परिमाण हो जाय तब मात्राको रोक देवे; फिर एक एक रत्तीके क्रमसे घटा देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी संग्रहणी, दुष्ट बवासीर, अरुचि, वमन, बहुत दिनोंका अतिसार, ज्वर, रक्तपित्त, क्षय और नेत्ररोग नष्ट होते हैं तथा अत्यंत शुक्रकी वृद्धि होती है, वलि और पलितरोग नष्ट होता है । अग्नि दीपन होती है। इसके सेवन कर- नेसे रोगीका शरीर फिर नवयुवकके समान होजाता है। इसको पञ्चा- मृतपर्पटी कहते हैं। लोहमें मर्दन करनेके कारण इसमें पथ्यादि क्रम लोहवत् करना चाहिये ॥ ६६-६७ ॥ अग्निकुमार रस । शुद्धसूतं समं गन्धं त्रिकटु पटुपञ्चकम् । दशकं तुल्यतुल्यञ्च विजया सर्वसम्मता ॥ ६८ ॥ भावयेच्चित्रभृङ्गोत्थैस्त्रिधा च विजयाद्रवैः ! दीप्ताग्निना तु यामैकं वालुकायन्त्रगे पचेत् ॥ ६९ ॥ संचूर्ण्य चार्द्रकद्रावैर्भावयित्वा च भक्षयेत् । मधुना शाणमानन्तु रसो ह्यग्निकुमारकः । दीप्ताग्निकारकः सामग्रहणीदोषनाशनः ॥ ७० ॥ पारा, गंधक, त्रिकुटा और पांचों लवण इन सब औषधियोंको समान भाग लेवे और सबकी बराबर भांग लेवे । फिर चित्रक, भांग, भांगरा इन तीनों औषधियोंके रसमें अलग अलग तीन तीन भावना देवे । पश्चात् प्रचण्ड अग्निके द्वारा वालुकायंत्रमें एक प्रहर पकावे। फिर अद-
( २१० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रखके रसमें भावना देवे । इस औषधिको छः मासे शहदके साथ सेवन करे । यह अत्यन्त अग्निप्रदीपक और संग्रहणी रोगको दूर करता है । इसको अग्निकुमार रस कहते हैं ॥ ६७-७० ॥ वडवामुख रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्राभ्रटङ्कणम् । सामुद्रञ्च यवक्षारं स्वर्जिसैन्धवनागरम् ॥ ७१ ॥ अपामार्गस्य च क्षारं पलाशवरुणस्य च । प्रत्येकं सूततुल्यं स्यादम्लयोगेन मर्दयेत् ॥ ७१ ॥ हस्तिशुण्डीद्रवैश्चाग्नौ मर्दयित्वा पुटेल्लघु । माषमात्रः प्रदातव्यो रसोऽयं वडवामुखः । ग्रहणीं विविधां हन्ति संग्रहग्रहणीं ज्वरम् ॥ ७३ ॥ पारा, गंधक, तांबा भस्म, अभ्रक भस्म, सुहागा, समुद्रलवण, जवा- खार, सज्जी, सेंधानमक, सोंठ, चिरचिटेका खार, ढाकका खार और वरनेका खार इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर कांजीमें खरल करे । फिर इसको हाथीशुंडीके रसमें खरल करके लघु पुटमें पकावे । एक मासे भर इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे ग्रहणी, संग्रहणी और ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ७१-७३ ॥ ग्रहणीकपाट रस । रसगन्धकयोश्चापि जातीफललवङ्गयोः । प्रत्येकं शाणमानञ्च श्लक्ष्णचूर्णीकृतं शुभम् ॥ ७४ ॥ सूर्यावर्त्तरसेनैव बिल्वपत्ररसेन च । शृङ्गाटकसमुद्भूतस्वरसेन च मर्दयेत् ॥ ७५ ॥ चण्डातपेन संशोष्य वटिकां कारयेद्भिषक् । बिल्वपत्ररसेनैव दापयेद्रक्तिकाद्वयम् ॥ ७६ ॥
भाषाटीकासहित । ( २११ ) दध्ना च भोजनीयञ्च ग्रहणीरोगनाशनः । पाण्डुरोगमतीसारं शोथं हन्ति तथा ज्वरम् । अयञ्च ग्रहणीरोगे कपाटो रस उत्तमः ॥ ७७ ॥ पारा, गंधक, जायफल और लौंग यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेवे, सबको एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे, फिर इसको बेलपत्तोंके रसमें, हुलहुलके पत्तोंके रसमें और सिंघाडेके रसमें खरल करके सूर्यकी प्रचण्ड धूपमें सुखा लेवे । फिर इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर बेलके पत्तोंके रसके साथ सेवन करे । इसपर दहीके साथ भात खावे । इस औषधिके सेवन करनेसे संग्रहणी, पांडु, अती- सार, शोथ और ज्वर नष्ट होते हैं । यह ग्रहणीरोगकी उत्कृष्ट औषधि है । इसको ग्रहणीकपाट रस कहते हैं ॥ ७४-७७ ॥ बृहद्ग्रहणीकपाट रस । मुक्ता सुवर्णं रसगन्धटङ्कमभ्रं कपद्दोऽमृततुल्य- भागः । शङ्खस्य चूर्णं सममत्र सर्वैर्भाव्यञ्च खल्ले- ऽतिविषाद्रवेण ॥ ७८ ॥ गोलञ्च कृत्वा मृदु कर्पटस्थं सम्पाच्य भाण्डे दिवसार्द्धकञ्च । सर्वाङ्गशीतो रस एष भाव्यो धूस्तूरवह्निर्मुसलीद्रवैश्च ॥ ७९ ॥ लोहस्य पात्रे परिभावितश्च सिद्धो भवेत्संग्रहणीकपाटः । वातोत्तरायां मरिचाज्ययुक्तः पित्तोत्तरायां मधु- पिप्पलीभिः॥८०॥कफोत्तरायां विजयारसेन कटु- त्रयेणाज्ययुतो ग्रहण्याम् । क्षये ज्वरे चार्शसि षट्- प्रकारे सामातिसारेऽरुचिपीनसे च ! मेहे च कृच्छ्रे गतधातुवृद्धौ गुञ्जाद्वयं चापि महामयघ्नम् ॥ ८१ ॥
( २१२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मोती, सोनाभस्म, पारा, गन्धक, सुहागा, अभ्रकभस्म, कौड़ी भस्म और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला और शंखभस्म ८ तोले लेवे; इन सब औषधियोंको एकत्रकर अतीसके रसमें डालकर खरल करे । फिर खरल करते करते जब अच्छे प्रकारसे गाढ़ा होजाय तब गोला बना लेवे । फिर उस पिंडको बारीक कपड़ेमें लपेटकर मन्द मन्द अग्निसे दो प्रहरतक पकावे । जब शीतल होजाय तब इस औष- धिको लोहेके पात्रमें डाल करके धतूरेकी जड़, चित्रककी जड़ और मुसली इन प्रत्येकके स्वरसकी भावना देवे । इस प्रकार यह वृहद- ग्रहणीकपाट रस तैयार होता है । इस औषधिको मरिचोंके चूर्ण और घृतके साथ वातज संग्रहणी रोगमें प्रयुक्त करे । शहद और पीपलके साथ पित्तज ग्रहणीमें, भांगके पत्तोंके रसके साथ और त्रिकुटेके चूर्णके साथ घीमें मिलाकर कफजन्य संग्रहणीमें प्रयोग करे । इस औषधिको दो रत्ती परिमाण लेकर नित्यप्रति सेवन करनेसे क्षय, ज्वर, छः प्रकारकी बवासीर, आमातीसार, अरुचि, पीनस, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र आदि समस्त रोग नष्ट होते हैं तथा शरीरमें सप्तधातुओंकी वृद्धि होकर देह पुष्ट होता है । इसको वृहद्ग्रहणीकपाट रस कहते हैं ॥ ७८–८१ ॥ प्रकारान्तरसे ग्रहणीकपाट रस । गिरिजाभवबीजकज्जली परिमर्द्यार्द्ररसेन शोषिता । कुटजस्य तु भस्मना पुनर्द्विगुणेनाथ विमर्द्य मिश्रिता८२ मर्दयित्वा प्रदातव्यमस्य गुञ्जाचतुष्टयम् । अजाक्षीरेण दातव्यं क्वाथेन कुटजस्य वा ॥ ८३ ॥ यूषं देयं मसूरस्य वारिभक्तञ्च शीतलम् । दध्ना सह पुनर्देयं ग्रासादौ रक्तिकाद्वयम् ॥ ८४ ॥ वर्द्धयेद्दशपर्यन्तं ह्रासयेत्क्रमशस्तथा । निहन्ति ग्रहणीं सर्वां विशेषात्कुक्षिमार्दवम् ॥ ८५ ॥
भाषाटीकासहित । ( २१३ ) पारा और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर कज्जली बनावे फिर अदरखके रसमें खरल करके सुखालेवे । फिर इसमें दुगुनी कुड़ेकी छालकी भस्म मिला लेवे; सबको अच्छे प्रकारसे खरल करके चार रत्ती परिमाण औषधि बकरीके दूधके साथ अथवा कुड़ेकी छालके क्वाथके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् मसूं- रका यूष और शालि चावलोंका भात शीतल करके भोजन करे । रक्तातिसार रोगमें इस औषधिको दहीके साथ दो रत्ती परिमाण सेवन करे और क्रमसे एक एक रत्ती प्रति दिन बढ़ाता जाय । जब दश रत्ती परिमाण होजाये तब फिर एक एक रत्ती परिमाण घटाता जाये । इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारका संग्रहणी रोग और मन्दाग्नि दूर होते हैं ॥ ८२-८५ ॥ विजयावटिका । हाटकं रजतं ताम्रं यद्यत्र परिदीयते । विजयाख्या तु सा ज्ञेया सर्वरोगनिषूदनी ॥ ८६ ॥ यदि उपरोक्त औषधिमें पारेकी बराबर सोनेकी भस्म, चांदीकी भस्म और तांबेकी भस्म मिलाकर गोली बना लेवे । इसको विजया- वटिका कहते हैं । यह विजयावटिका पूर्वोक्त गुणोंवाली और सम्पूर्ण रोगोंको दूर करती है ॥ ८६ ॥ ग्रहणीकपर्दपोट्टली । कपर्दतुल्यं रसकं तु गन्धकं लोहं मृतं टंकणकञ्च तुल्यम् । जयारसैनैकदिनं विमर्द्य चूर्णेन संवेष्ट्य पुटेच्च भाण्डे ॥ ददीत तत्पोट्टलिकाभिधानं वात- प्रधानां ग्रहणीं निहन्ति ॥ ८७ ॥ कौड़ीकी भस्म, पारा, गंधक, लोहभस्म और सुहागा इन सब औषधियोंको एकत्र भांगके पत्तोंके रसमें एकदिन खरल करके गोला-
( २१४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कार करलेवे । फिर इस गोलेको शंखके चूनेमें वेष्टित करके संपुट कर पुटपाक करे । यह औषधि वातज संग्रहणी रोगमें अतीव हितकारी है । इसको ग्रहणीकपर्दपोट्टली रस कहते हैं ॥ ८७ ॥ हंसपोट्टली रस । दग्धान् कपर्दकान् पिष्ट्वा त्र्यूषणं टंकणं विषम् । गन्धकं शुद्धसूतञ्च तुल्यं जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ ८८ ॥ मर्दयेद्भक्षयेन्माषं मारिचाद्रैं लिहेदनु । निहन्ति ग्रहणीरोगं पथ्यं तक्रोदनं हितम् ॥ ८९ ॥ कौड़ीकी भस्म, सोंठ, मरिच, पीपल, सुहागा, विष, शुद्ध गंधक और शुद्ध पारा इन सबको बराबर लेकर जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करे । इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि सेवन करे और ऊपरसे कालीमरिच और अदरखके रसका अनुपान करे । इससे संग्रहणीरोग तत्काल नष्ट होजाता है । इसपर तक्र और भात पथ्य है ॥ ८८॥ ८९ ॥ ग्रहणीकपाट रस । तुल्यं कान्तं रसं तालं माक्षिकं टंकणन्तथा । सपादनिष्कं प्रत्येकं पञ्चनिष्कं वराटकम् ॥९०॥ द्विनिष्कं गन्धकं सर्वं पिष्ट्वा जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ अर्द्धभारकरीषेण पुटितं भस्मशोभनम् । प्रदद्याद् ग्रहणीगुल्मक्षयकुष्ठप्रमेहके ॥ ९१ ॥ कान्तलोहभस्म, पारा, हरितालभस्म, सोनामाखीकी भस्म और सुहागा यह प्रत्येक औषधि सवा चार चार मासे, कौडीकी भस्म २० मासे और शुद्ध गंधक आठ ८ मासे लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके गोला बना लेवे । फिर गोलेको एक मूषामें संपुट करके ५० सेर जंगली उपलोंकी आंच दे,