रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 229, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २०३ ) भावयेत्सर्वमेकत्र केशराजरसैः पुनः । चणकाभा वटी कार्या छागीदुग्धेन पेषिता ॥ ४१ ॥ अनुपानं प्रदातव्यं दग्धबिल्वं समं गुडैः । हन्ति सर्वानतीसारान् ग्रहणीं चिरजामपि ॥ ४२ ॥ आमसम्पाचनो सम्यग् वह्निवृद्धिकरस्तथा । पीयूषवल्लीनामायं ग्रहणीरोगनाशनः ॥ ४३ ॥ पारा, अभ्रकभस्म, शुद्ध गंधक, रूपाभस्म, लोहाभस्म, सुहागा, रसौत और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेवे; लौंग, चन्दन, नागरमोथा, पाठ, जीरा, धनिया, वराहक्रान्ता, अतीस, लोध, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, दालचीनी, जायफल, सोंठ, बेलगिरी, नागकेशर, अनारके पत्ते, मंजीठ, धायके फूल और कूठ यह प्रत्येक औषधि पारेकी बराबर अर्थात् चार चार मासे लेवे; ( कितने एक वैद्य यहां आठ आठ मासे औषधि लेनी चाहिये ऐसा कहते हैं ) इन सबको एकत्रकर कुकुरभांगरेके रसमें भावना दे; पश्चात् बकरीके दूधमें पीसकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिका भुने हुए बेल और गुड़के साथ सेवन करे। यह औषधि सब प्रकारके अतीसार और बहुत दिनोंकी पुरानी संग्रहणी रोगको दूर करती है । यह ग्रहणीरोगको हरने- वाला, आमको पचानेवाला और अच्छे प्रकारसे अग्निको दीपन करने- वाला पीयूषवल्ली रस है ॥ ३८-४३ ॥ ग्रहणीशार्दूल रस । रस-गन्धकयोश्चापि कर्षमेकं सुशोधितम् । द्वयोः कज्जलिकां कृत्वा हाटकं षोडशांशतः ॥ ४४ ॥ लवङ्गं निम्बपत्रञ्च जातीकोषफले तथा । एतेषां कर्षचूर्णेन सूक्ष्मैलां सह मेलयेत् ॥ ४५ ॥