रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बलवर्णाग्निजननी सेविता च चिरायुषी । कंडूं कुष्ठं विसर्पञ्च गुदभ्रंशं क्रिमिं जयेत् ॥ ३६ ॥ माषद्वयां वटीं खादेच्छागीदुग्धानुपानतः । वयोऽग्निबलमावीक्ष्य युक्त्या वा त्रुटिवर्धनम्॥३७॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, शंखभस्म, सुहागा, हींग, कचूर, तालीश- पत्र, नागरमोथा, धनिया, जीरा, सेंधानमक, धायके फूल, अतीस, सोंठ, घरका धुँआसा, हरड़, भिलावे, तेजपात, जायफल, लौंग, दार- चीनी, इलायची, सुगंधवाला, बेलगिरी, मेथी और भांग इन सबको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसकर गोली बना लेवे । श्रीमद्गहनानन्दने रसायन अधिकारमें यह ग्रहणी गजेन्द्रवाटिका लोककी रक्षाके लिये कही है । यह अनेक प्रकारकी ग्रहणी, ज्वर, अतिसार, शूल, गुल्म, अम्लपित्त, कामला, हलीमक, कण्डू, कुष्ठ, वीसर्प, गुदभ्रंश और क्रिमिरोगको दूर करती है । यह गोली तोलमें दो दो मासेकी बनानी चाहिये और प्रतिदिन एक गोली बकरीके दूधके साथ सेवन करनी चाहिये । अथवा रोगीकी अवस्था, बल और अग्निको देखकर उपरोक्त दो मासेके अतिरिक्त कम अथवा ज्यादा मात्राका निरूपण करे । यह गोली बल और वर्णको बढ़ाती है तथा अवस्थाको स्थापित करती है ॥ ३०-३७ ॥ पीयूषवल्लीरस । सूतमभ्रं गन्धकञ्च तारं लौहं सटङ्कणम् । रसाञ्जनं माक्षिकञ्च शाणमेकं पृथक् पृथक् ॥ ३८ ॥ लवंगं चन्दनं मुस्तं पाठा जीरक-धान्यकम् । समङ्गाऽतिविषा लोध्रं कुटजेन्द्रयवं त्वचम् ॥३९॥ जातीफलं विश्वबिल्वं कनकं दाडिमीच्छदम् । समङ्गा धातकी कुष्ठं प्रत्येकं रससम्मितम् ॥४०॥