रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २१३ ) पारा और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर कज्जली बनावे फिर अदरखके रसमें खरल करके सुखालेवे । फिर इसमें दुगुनी कुड़ेकी छालकी भस्म मिला लेवे; सबको अच्छे प्रकारसे खरल करके चार रत्ती परिमाण औषधि बकरीके दूधके साथ अथवा कुड़ेकी छालके क्वाथके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् मसूं- रका यूष और शालि चावलोंका भात शीतल करके भोजन करे । रक्तातिसार रोगमें इस औषधिको दहीके साथ दो रत्ती परिमाण सेवन करे और क्रमसे एक एक रत्ती प्रति दिन बढ़ाता जाय । जब दश रत्ती परिमाण होजाये तब फिर एक एक रत्ती परिमाण घटाता जाये । इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारका संग्रहणी रोग और मन्दाग्नि दूर होते हैं ॥ ८२-८५ ॥ विजयावटिका । हाटकं रजतं ताम्रं यद्यत्र परिदीयते । विजयाख्या तु सा ज्ञेया सर्वरोगनिषूदनी ॥ ८६ ॥ यदि उपरोक्त औषधिमें पारेकी बराबर सोनेकी भस्म, चांदीकी भस्म और तांबेकी भस्म मिलाकर गोली बना लेवे । इसको विजया- वटिका कहते हैं । यह विजयावटिका पूर्वोक्त गुणोंवाली और सम्पूर्ण रोगोंको दूर करती है ॥ ८६ ॥ ग्रहणीकपर्दपोट्टली । कपर्दतुल्यं रसकं तु गन्धकं लोहं मृतं टंकणकञ्च तुल्यम् । जयारसैनैकदिनं विमर्द्य चूर्णेन संवेष्ट्य पुटेच्च भाण्डे ॥ ददीत तत्पोट्टलिकाभिधानं वात- प्रधानां ग्रहणीं निहन्ति ॥ ८७ ॥ कौड़ीकी भस्म, पारा, गंधक, लोहभस्म और सुहागा इन सब औषधियोंको एकत्र भांगके पत्तोंके रसमें एकदिन खरल करके गोला-