भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( २१४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कार करलेवे । फिर इस गोलेको शंखके चूनेमें वेष्टित करके संपुट कर पुटपाक करे । यह औषधि वातज संग्रहणी रोगमें अतीव हितकारी है । इसको ग्रहणीकपर्दपोट्टली रस कहते हैं ॥ ८७ ॥ हंसपोट्टली रस । दग्धान् कपर्दकान् पिष्ट्वा त्र्यूषणं टंकणं विषम् । गन्धकं शुद्धसूतञ्च तुल्यं जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ ८८ ॥ मर्दयेद्भक्षयेन्माषं मारिचाद्रैं लिहेदनु । निहन्ति ग्रहणीरोगं पथ्यं तक्रोदनं हितम् ॥ ८९ ॥ कौड़ीकी भस्म, सोंठ, मरिच, पीपल, सुहागा, विष, शुद्ध गंधक और शुद्ध पारा इन सबको बराबर लेकर जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करे । इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि सेवन करे और ऊपरसे कालीमरिच और अदरखके रसका अनुपान करे । इससे संग्रहणीरोग तत्काल नष्ट होजाता है । इसपर तक्र और भात पथ्य है ॥ ८८॥ ८९ ॥ ग्रहणीकपाट रस । तुल्यं कान्तं रसं तालं माक्षिकं टंकणन्तथा । सपादनिष्कं प्रत्येकं पञ्चनिष्कं वराटकम् ॥९०॥ द्विनिष्कं गन्धकं सर्वं पिष्ट्वा जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ अर्द्धभारकरीषेण पुटितं भस्मशोभनम् । प्रदद्याद् ग्रहणीगुल्मक्षयकुष्ठप्रमेहके ॥ ९१ ॥ कान्तलोहभस्म, पारा, हरितालभस्म, सोनामाखीकी भस्म और सुहागा यह प्रत्येक औषधि सवा चार चार मासे, कौडीकी भस्म २० मासे और शुद्ध गंधक आठ ८ मासे लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके गोला बना लेवे । फिर गोलेको एक मूषामें संपुट करके ५० सेर जंगली उपलोंकी आंच दे,