रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
DevanagariHindipublished584 पृष्ठ
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भाषाटीकासहित । ( २१६ ) स्वयं शीतल होनेपर संपुटको निकालकर औषधिका चूर्ण कर लेवे। इस औषधिके यथोचित मात्रा और यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी, गुल्म,क्षय,कुष्ठ और प्रमेह रोग नष्ट होते हैं। इसको ग्रहणीकपाट रस कहते हैं ॥ ९० ॥ ९१ ॥ रसाभ्रगन्धान् क्रमवृद्धियुक्ताऽङ्गारसेन त्रिदिनं विमर्द्य । जयन्तिकाभृङ्ककलम्बिनीरैर्दिनं यवक्षार- सटंकणञ्च॥९२॥क्षित्त्वा तु गन्धस्य च तुल्यभागं वातारितैलेन युतं पुटित्वा । गुडूचिका शाल्म- लिकारसेन जयारसेनापि विमर्द्य शाणम् ॥ मरीच- सार्द्धं मधुना समेतं ददीत पथ्यं दधिभक्तकञ्च॥९३ दूसरा ग्रहणीकपाट रस–पारा १ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग और गन्धक ३ भाग लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर काकजंघाके रसमें तीन दिन तक