भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भावयेत्सप्तधा वज्रकपाटः स्याद्रसोत्तमः । माषद्वयं त्रयं वास्य मधुना ग्रहणीं जयेत् ॥ ९६ ॥ पारा, गन्धक, जवाखार, जयंती, वच, अभ्रकभस्म और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जयंती, भांगरा और जम्भीरी नींबूके रसमें तीन दिन तक खरल करके गोला बना लेवे । फिर इस गोलेको पानके पत्तोंमें लपेट संपुट कर हांडीमें रख चार घड़ी तक मन्दाग्निसे स्वेदन करे; फिर शीतल होनेपर जयन्तीके रसकी सात, सेम- लकी जड़के रसकी सात और भांगके रसकी सात भावना देवे । इसको दो मासे अथवा तीन मासे परिमाण शहदके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी रोग नष्ट होता है । इसको ग्रहणीवज्रकपाट रस कहते हैं ॥ ९४–९६॥ तारमौक्तिकहेमानि सारश्चैकैकभागिकम् । द्विभागो गन्धकः सूतस्त्रिभागो मर्दयेदिमान् ॥९७॥ कपित्थस्वरसैर्गाढं मृगशृङ्गे ततः क्षिपेत् । पुटेन्मध्यपुटेनैव तत उद्धृत्य मर्दयेत् ॥ ९८ ॥ बलारसैः सप्तधैवमपामार्गरसैस्त्रिधा । लोध्रप्रतिविपामुस्ताघातकीन्द्रयवामृताः ॥ ९९ ॥ प्रत्येकमेतत्स्वरसैर्भावना स्यात्त्रिधा त्रिधा ॥ माषमात्रो रसो देयो मधुना मरिचैस्तथा ॥१००॥ हन्ति सर्वानतीसारान् ग्रहणीं सर्वजामपि ॥ कपाटो ग्रहणीरोगे रसोऽयं वह्निदीपनः ॥१०१॥ द्वितीय ग्रहणीवज्रकपाट रस—चांदी, मोती, सोना और लोहा इन सबकी भस्म एक एक भाग, गन्धक २ भाग और पारा ३ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको कैथके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके एक