भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( २१७ ) हिरनके सींगमें भर देवे और ऊपरसे मृत्तिकादि बन्द करके मध्यम रीतिसे पुटपाक करे । जब शीतल हो जाये तब सींगमेंसे औषधि निकालकर खिरेंटीकी जड़के रसमें सात तथा चिरचिटा, लोध, अतीस, नागरमोथा, धायके फूल, इद्रजौ और गिलोय इन प्रत्येकके रसके द्वारा तीन तीन भावना देवे । इसमेंसे एक मासे औषधि लेकर शहद और काली मिरचोंके चूर्णमें मिलाकर सेवन करनेसे अतीसार और सर्वदोषजग्रहणीरोग नष्ट होता है, अग्नि दीप्त होती है । यह रस ग्रहणीकपाट रसके समान गुणोंवाला है ॥ ९७-१०१ ॥ पानीयभक्तवटी । कृष्णाऽभ्रलोहमलशुद्धविडङ्गचूर्णं प्रत्येकमेव पलिकं विधिवद्विधाय । चव्यं कटुत्रयफलत्रयकेशराजदंती- पयोदचपलाऽनलघण्टकर्णाः ॥ २ ॥ माणोलकुञ्च- बृहतीत्रिवृताः ससूर्यावर्त्ताः पुनर्नविकया सहिता- स्त्वमीषाम् । मूलं प्रतिप्रतिविशोधितमक्षमेकं चूर्णं तदर्द्धरसगन्धकमेकसंस्थम् ॥ ३ ॥ कृत्वाऽऽर्द्रकीय- रससंवलितञ्च भूयः सम्पेष्य तस्य वटिका विधि- वद्विधेया । हन्त्यम्लपित्तमरुचिं ग्रहणीमसाध्यां दुर्नामकामलभगन्दरशोथगुल्मान् ॥ ४ ॥ शूलञ्च पाकजनितं सतताग्निमान्द्यं सद्यः करोत्यपचितिं चिरनष्टवह्नेः । कुष्ठं निहन्ति पलितञ्च वलिं प्रवृद्धां श्वासं च कासमपि पाण्डुगदं निहन्ति ॥ ५ ॥ काले अभ्रककी भस्म १ पल, मण्डूर १ पल, वायविडंगका चूर्ण १ पल, चव्य, सोंठ, पीपल, मरिच, हरड़, बहेड़ा, आमला, कुकुर- भांगरा, दंतीमूल, नागरमोथा, पीपल, चित्रकमूल, घण्टाकर्ण, मानकंद, बडहर, कटेरी, निशोथ, हुलहुल और पुनर्नवा प्रत्येकका मूल चूर्ण एक