भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एक तोला, इन सब द्रव्योंसे आधी पारे गंधककी कज्जली करके सबको मिलाकर अदरखके रसमें बार बार खरल करके गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेसे अम्लपित्त, अरुचि, संग्रहणी, बवासीर, कामला, भगंदर, शोथ, गुल्म, परिणामशूल, मन्दाग्नि और बहुत दिनोंके उत्पन्न हुए अग्निके दोष सब नष्ट होजाते हैं तथा अग्नि अत्यन्त दीपन होती है । इसके सेवनसे कुष्ठरोग, वलि, पलित, श्वास, खांसी और पाण्डुरोग यह सब नष्ट होते हैं ॥ २–५ ॥ वार्यन्नमांसदधिकाञ्जिकतक्रमत्स्यवृक्षाम्लतैलपरि- पक्वभुजो यथेष्टम् । शृङ्गाटबिल्वगुडकंचटनारि- केलदुग्धानि सर्वद्विदलानि विवर्जयेत्तु ॥ ६ ॥ इस औषधिके सेवनके अन्तमें जलके साथ सिद्ध किया भात, मांस- रस, दही, कांजी, तक्र, मत्स्य, तिंतडी और तेलमें पकाये हुए समस्त पदार्थ यथेष्ट भक्षण करे । सिंघाड़े, बेल, गुड़, जलपीपल, नारियल, दूध और सब प्रकारके दो दो दलवाले अन्न त्याग देवे ॥ ६ ॥ शम्बूकादिवटी । दग्धशम्बूकसिन्धूत्थं तुल्यं क्षौद्रेण मर्दयेत् । निष्कैकेन निहन्त्याशु वातसंग्रहणीगदम् ॥ ७ ॥ घोंघे (छोटे शंख) की भस्म और सेंधानमक दोनों बराबर भाग ले पीसकर शहदमें मिलाकर तीन मासे परिमाण सेवन करनेसे वातज ग्रहणीरोग शीघ्र ही नष्ट होजाता है । इसे शम्बूकादिवटी कहते हैं ७ हिरण्यगर्भपोट्टली रस । एकांशो रसराजस्य ग्राह्यो द्वौ हाटकस्य च । मुक्ताफलस्य चत्वारो भागाः षड् दीर्घनिःस्वनात् ८॥ त्र्यंशं बलेर्वराट्याश्च टङ्कणो रसपादिकः । पक्वनिम्बुकतोयेन सर्वमेवात्र मर्दयेत् ॥ ९ ॥