रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २१९ ) मूषामध्ये न्यसेत्कल्कं तस्य वक्त्रं निरोधयेत् ॥ गर्त्तेऽरत्निप्रमाणे तु पुटेत् त्रिंशद्वनोपलैः ॥ ११० ॥ स्वाङ्गशीतलतां ज्ञात्वा रसं मूषोदरात्नयेत् । ततः खल्लोदरे मर्द्यं सुधारूपं समुद्धरेत् ॥ १११ ॥ एतस्यामृतरूपस्य दद्याद्गुञ्चाचतुष्टयम् । घृतमाध्वीकसंयुक्तमेकोनत्रिंशदूषणैः ॥ १२ ॥ मन्दाग्नौ रोगसंघे च ग्रहण्यां विषमज्वरे । गुदाङ्कुरे महाशूले पीनसे श्वासकासयोः ॥ १३ ॥ अतीसारे महाव्याधौ श्वयथौ पाण्डुके गदे । सर्वेषु कुष्ठरोगेषु यकृत्प्लीहोदरेषु च ॥ १४ ॥ वातपित्तकफोत्थेषु द्वन्द्वजेषु त्रिजेषु च । दद्यात्सर्वेषु रोगेषु श्रेष्ठमेतद्रसायनम् ॥ १५ ॥ पारा १ भाग, सुवर्णभस्म २ भाग, मोती ४ भाग, शंखभस्म ६ भाग, गन्धक ३ भाग, कौड़ीकी भस्म ३ भाग और सुहागा पारेसे चौथाई भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके पके हुए नींबूके रसमें खरल करके मूषामें संपुट करे । फिर इस मूषाको एक हाथ परिमाण गहरे गढेमें ३० जंगली उपलोंके बीचमें रख यथोक्त विधिसे अग्नि देवे । जब पककर अपने आप शीतल होजाये तब मूषामेंसे औषधियोंको निकालकर खरलमें डालकर पीस लेवे । फिर इस अमृतके समान औषधिमेंसे चार रत्ती परिमाण लेकर घी, शहद और उनतीस काली मिरचोंके साथ मन्दाग्नि रोग, रोगसंकर, संग्रहणीरोग, विषमज्वर, अर्शरोग, भयंकरशूल, पीनस, श्वासरोग, खांसी, अतिसार, शोथ, पाण्डुरोग, सब प्रकारके कुष्ठ रोग, यकृत् और प्लीहा रोग, उदररोग, वातज रोग, पित्तज रोग, कफज रोग, द्विदोषज रोग, त्रिदोषज