भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 246

( २२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रोग और सब प्रकारके रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये । यह उत्तम रसायन है । इसको हिरण्यगर्भपोट्टली रस कहते हैं ॥ ८-१५ ॥ रसाभ्रवटी । शुद्धसूतस्य कर्षैकं कर्षैकं गन्धकस्य च । द्वयोः कज्जलिकों कृत्वा तुल्यं व्योम प्रदापयेत् ॥१६ केशराजस्य भृंगस्य निर्गुण्ड्याश्चित्रकस्य च । ग्रीष्मसुन्दरमण्डूकीजयन्तीन्द्राशनस्य च ॥ १७ ॥ श्वेतापराजितायाश्च स्वरसं पर्णसम्भवम् । रसतुल्यं प्रदातव्यं चूर्णञ्च मरिचोद्भवम् ॥ १८ ॥ देयं रसार्द्धभागेन चूर्णं टंकणसम्भवम् । संमर्द्य वटिकां कुर्यात्कलायसदृशीं बुधः ॥ १९ ॥ हन्ति कासं क्षयं श्वासं वातश्लेष्मभवं रुजम् । ज्वरे चैवातिसारे च सिद्ध एष प्रयोगराट् ॥ १२०॥ चातुर्थिके ज्वरे श्रेष्ठो ग्रहण्यांतकनाशनः । दधि चावश्यकं देयं प्राह नागार्जुनो मुनिः ॥ २१॥ शुद्ध पारा १ कर्ष, शुद्ध गन्धक १ कर्ष, दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर और सबकी बराबर अभ्रक भस्म मिलाकर कुकुरभांगरा, भांगरा, निर्गुण्डी, चित्रकमूल, ग्रीष्मसुन्दर, मण्डूकपर्णी, जयन्ती, भांग, सुफेद कोयलकी जड़ और पान इन प्रत्येकका स्वरस एक एक कर्ष परिमाण, मरिचका चूर्ण १ कर्ष और सुहागा ६ मासे इन सबको एकत्र खरल करके मटरके प्रमाण गोली बनावे । यह यथाविधि सेवन करनेसे खांसी, क्षय, श्वास, वातकफोत्पन्न रोग, ज्वर, अतिसार, चातुर्थिकज्वर और संग्रहणी रोगमें तत्काल फल देनेवाली सिद्ध औषधि है । इस औषधिके सेवन करनेसे अन्तमें दही पीना चाहिये । इस रसाभ्र - वटीको नागार्जुन मुनिने कहा है ॥ १६-२१ ॥