रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २२१ ) अग्निकुमार रस। रसं गन्धं विषं व्योषं टंकणं लौहभस्मकम् । अजमोदाहिफेनञ्च सर्वतुल्यं मृताभ्रकम् ॥ चित्रकस्य कषायेण मर्दयेद्याममात्रकम् ॥ २२॥ मरिचाभां वटीं खादेदजीर्णं ग्रहणीन्तथा । नाशयेन्नात्र सन्देहो गुह्यमेतच्चिकित्सितम् ॥ रसश्चानिकुमारोऽयं दीपयत्याशु पावकम् ॥ २३ ॥ पारा, गन्धक, विष, सोंठ, मरिच, पीपल, सुहागा, लोहभस्म, अजमोद और अफीम यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और सब औषधियोंके बराबर अभ्रककी भस्म इन सबको एकत्र चीतेकी जड़के रस या काथमें भावना देकर मरिचकी बराबर गोली बनालेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे अजीर्ण और संग्रहणी रोग नष्ट होते हैं । यह जठराग्निको बहुत जल्दी प्रदीप्त करता है। इसको अग्निकुमार रस कहते हैं ॥२२॥२३ ॥ नृपतिवल्लभ रस । जातीफललवङ्गाब्दत्वगेलाटंकरामठम् । जीरकं तेजपत्रञ्च यमानीविश्वसैन्धवाः ॥ २४ ॥ लौहमभ्रं रसो गन्धताम्रं प्रत्येकशः पलम् । मरिचं द्विपलं दत्त्वा छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ २५ ॥ धात्रीरसेन वा पेष्यं वटिकाः कुरु यत्नतः । श्रीमद्गहननाथेन विचिन्त्य परिनिर्मितः ॥ २६ ॥ जायफल, लौंग, नागरमोथा, दालचीनी, इलायची, सुहागा, हींग, जीरा, तेजपात, अजवायन, सेंधानमक, सोंठ, लोहभस्म, अभ्रक- भस्म, पारा, गन्धक और तांबेकी भस्म यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले तथा कालीमिरच ८ तोला इन सबको एकत्र बकरीके दूधमें पीसकर अथवा आंमलोंके रसमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली