रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बना लेवे । इसको श्रीमद्गहनानन्दनाथने विशेष विचारपूर्वक निर्माण किया है ॥ २४-२६ ॥ सूर्यवत्तेजसा चायं रसो नृपतिवल्लभः । अष्टादशवटीं खादेत्पवित्रः सूर्यदर्शकः ॥ २७ ॥ हन्ति मन्दानलं सर्वमामदोषं विषूचिकाम् । प्लीहगुल्मोदराष्ठीलायकृत्पाण्डुत्वकामलाम् ॥ २८ ॥ सर्वानेव गदान् हन्ति चण्डांशुरिव पापहा । बलवर्णकरो हृद्य आयुष्यो वीर्यवर्द्धनः ॥ २९ ॥ परं वाजीकरः श्रेष्ठः पटुदो मन्त्रसिद्धिदः । अरोगी दीर्घजीवी स्याद्रोगी रोगाद्विमुच्यते॥१३०॥ रसस्यास्य प्रसादेन बुद्धिमाञ्जायते नरः । बदरास्थिप्रमाणेण वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ३१ ॥ इस नृपतिवल्लभ रसका प्रताप सूर्यके समान है। इसकी १८ गोली पवित्र और सूर्यके दर्शन करनेवाला मनुष्य भक्षण करे । यह रस मंदाग्नि, सब प्रकारका आमदोष, विषूचिका, प्लीहा, गुल्म, उदररोग, अष्ठीला, यकृत्रोग, पांडुरोग, कामला और सब प्रकारके रोगोंको दूर करता है; बल और वर्णको बढ़ानेवाला, हृदयको हितकारी, अवस्थाको स्थापन करनेवाला, वीर्यवर्द्धक, श्रेष्ठ,परम वाजीकरण और चतुरताको देनेवाला है । इसका नित्य सेवन करनेवाला मनुष्य सदैव निरोगी, बहुत कालतक जीनेवाला होता है और रोगी मनुष्य रोगसे मुक्त होजाता है । इस रसके प्रसादसे मनुष्य बुद्धिमान् हो जाता है । इसकी बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बनानी चाहिये ॥ २७-३१ ॥ राजवल्लभ रस । जातीफललवङ्गाब्दत्वगेलाटङ्करामठम् । जीरकं तेजपत्रञ्च यमानीविश्वसैन्धवम् ॥ ३२ ॥