भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( २२३ ) लौहमभ्रं सताम्रञ्च रसगन्धकमेव च । मरिचं त्रिवृतं रूप्यं प्रत्येकं द्विपलोन्मितम् ॥ ३३ ॥ धात्रीरसे वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जाफलमानतः । हन्ति शूलं तथा गुल्ममामवातं सुदारुणम् ॥ ३४ ॥ हृच्छूलं पार्श्वशूलञ्च चक्षुःशूलं हलीमकम् । शिरःशूलं कटीशूलमानाहमष्टशूलकम् ॥ ३५ ॥ क्रिमिकुष्ठानि दद्रुञ्च वातरक्तं भगन्दरम् । उपदंशमतीसारं ग्रहण्यर्शःप्रवाहिकाम् ॥ नृपवल्लभराजोऽयं महेशेन प्रकाशितः ॥ ३६ ॥ जायफल, लौंग, नागरमोथा, दालचीनी, इलायची, सुहागा, हींग, जीरा, तेजपात, अजवायन, सोंठ, सेंधानमक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, तांबेकी भस्म, पारा, गन्धक, कालीमिरच, निसोध और चांदीभस्म यह प्रत्येक औषधि दो दो पल लेवे,इन सब औषधियोंको एकत्र करके आंमलोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बनावे । इन गोलि- योंके सेवन करनेसे शूल, गुल्म, आमवात, हृदयशूल, पार्श्वशूल, चक्षुःशूल, हलीमक, शिरःशूल, कटिशूल, आनाह, अष्ट प्रकारका शूल, कृमि, कुष्ठ, दद्रु, वातरक्त, भगन्दर, उपदंश, अतिसार, संग्रहणी, बवा- सीर और प्रवाहिकादि समस्त रोग नष्ट होते हैं । इस नृपवल्लभराज रसको स्वयं महादेवजीने कहा है ॥ ३२-३६ ॥ बृहन्नृपवल्लभ । रसगन्धकलौहाभ्रं नागं चित्रं त्रिवृत्समम् । टङ्कं जातीफलं हिंगुत्वगेलाब्दलवंगकम् ॥ ३७ ॥ तेजपत्रमजाजीं च यमानीविश्वसैन्धवम् । प्रत्येकं तोलकं चूर्णं मरीचतारयोस्तथा ॥ ३८ ॥