रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मोती, सोनाभस्म, पारा, गन्धक, सुहागा, अभ्रकभस्म, कौड़ी भस्म और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला और शंखभस्म ८ तोले लेवे; इन सब औषधियोंको एकत्रकर अतीसके रसमें डालकर खरल करे । फिर खरल करते करते जब अच्छे प्रकारसे गाढ़ा होजाय तब गोला बना लेवे । फिर उस पिंडको बारीक कपड़ेमें लपेटकर मन्द मन्द अग्निसे दो प्रहरतक पकावे । जब शीतल होजाय तब इस औष- धिको लोहेके पात्रमें डाल करके धतूरेकी जड़, चित्रककी जड़ और मुसली इन प्रत्येकके स्वरसकी भावना देवे । इस प्रकार यह वृहद- ग्रहणीकपाट रस तैयार होता है । इस औषधिको मरिचोंके चूर्ण और घृतके साथ वातज संग्रहणी रोगमें प्रयुक्त करे । शहद और पीपलके साथ पित्तज ग्रहणीमें, भांगके पत्तोंके रसके साथ और त्रिकुटेके चूर्णके साथ घीमें मिलाकर कफजन्य संग्रहणीमें प्रयोग करे । इस औषधिको दो रत्ती परिमाण लेकर नित्यप्रति सेवन करनेसे क्षय, ज्वर, छः प्रकारकी बवासीर, आमातीसार, अरुचि, पीनस, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र आदि समस्त रोग नष्ट होते हैं तथा शरीरमें सप्तधातुओंकी वृद्धि होकर देह पुष्ट होता है । इसको वृहद्ग्रहणीकपाट रस कहते हैं ॥ ७८–८१ ॥ प्रकारान्तरसे ग्रहणीकपाट रस । गिरिजाभवबीजकज्जली परिमर्द्यार्द्ररसेन शोषिता । कुटजस्य तु भस्मना पुनर्द्विगुणेनाथ विमर्द्य मिश्रिता८२ मर्दयित्वा प्रदातव्यमस्य गुञ्जाचतुष्टयम् । अजाक्षीरेण दातव्यं क्वाथेन कुटजस्य वा ॥ ८३ ॥ यूषं देयं मसूरस्य वारिभक्तञ्च शीतलम् । दध्ना सह पुनर्देयं ग्रासादौ रक्तिकाद्वयम् ॥ ८४ ॥ वर्द्धयेद्दशपर्यन्तं ह्रासयेत्क्रमशस्तथा । निहन्ति ग्रहणीं सर्वां विशेषात्कुक्षिमार्दवम् ॥ ८५ ॥