भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित । ( २११ ) दध्ना च भोजनीयञ्च ग्रहणीरोगनाशनः । पाण्डुरोगमतीसारं शोथं हन्ति तथा ज्वरम् । अयञ्च ग्रहणीरोगे कपाटो रस उत्तमः ॥ ७७ ॥ पारा, गंधक, जायफल और लौंग यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेवे, सबको एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे, फिर इसको बेलपत्तोंके रसमें, हुलहुलके पत्तोंके रसमें और सिंघाडेके रसमें खरल करके सूर्यकी प्रचण्ड धूपमें सुखा लेवे । फिर इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर बेलके पत्तोंके रसके साथ सेवन करे । इसपर दहीके साथ भात खावे । इस औषधिके सेवन करनेसे संग्रहणी, पांडु, अती- सार, शोथ और ज्वर नष्ट होते हैं । यह ग्रहणीरोगकी उत्कृष्ट औषधि है । इसको ग्रहणीकपाट रस कहते हैं ॥ ७४-७७ ॥ बृहद्ग्रहणीकपाट रस । मुक्ता सुवर्णं रसगन्धटङ्कमभ्रं कपद्दोऽमृततुल्य- भागः । शङ्खस्य चूर्णं सममत्र सर्वैर्भाव्यञ्च खल्ले- ऽतिविषाद्रवेण ॥ ७८ ॥ गोलञ्च कृत्वा मृदु कर्पटस्थं सम्पाच्य भाण्डे दिवसार्द्धकञ्च । सर्वाङ्गशीतो रस एष भाव्यो धूस्तूरवह्निर्मुसलीद्रवैश्च ॥ ७९ ॥ लोहस्य पात्रे परिभावितश्च सिद्धो भवेत्संग्रहणीकपाटः । वातोत्तरायां मरिचाज्ययुक्तः पित्तोत्तरायां मधु- पिप्पलीभिः॥८०॥कफोत्तरायां विजयारसेन कटु- त्रयेणाज्ययुतो ग्रहण्याम् । क्षये ज्वरे चार्शसि षट्- प्रकारे सामातिसारेऽरुचिपीनसे च ! मेहे च कृच्छ्रे गतधातुवृद्धौ गुञ्जाद्वयं चापि महामयघ्नम् ॥ ८१ ॥