रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २१० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रखके रसमें भावना देवे । इस औषधिको छः मासे शहदके साथ सेवन करे । यह अत्यन्त अग्निप्रदीपक और संग्रहणी रोगको दूर करता है । इसको अग्निकुमार रस कहते हैं ॥ ६७-७० ॥ वडवामुख रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्राभ्रटङ्कणम् । सामुद्रञ्च यवक्षारं स्वर्जिसैन्धवनागरम् ॥ ७१ ॥ अपामार्गस्य च क्षारं पलाशवरुणस्य च । प्रत्येकं सूततुल्यं स्यादम्लयोगेन मर्दयेत् ॥ ७१ ॥ हस्तिशुण्डीद्रवैश्चाग्नौ मर्दयित्वा पुटेल्लघु । माषमात्रः प्रदातव्यो रसोऽयं वडवामुखः । ग्रहणीं विविधां हन्ति संग्रहग्रहणीं ज्वरम् ॥ ७३ ॥ पारा, गंधक, तांबा भस्म, अभ्रक भस्म, सुहागा, समुद्रलवण, जवा- खार, सज्जी, सेंधानमक, सोंठ, चिरचिटेका खार, ढाकका खार और वरनेका खार इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर कांजीमें खरल करे । फिर इसको हाथीशुंडीके रसमें खरल करके लघु पुटमें पकावे । एक मासे भर इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे ग्रहणी, संग्रहणी और ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ७१-७३ ॥ ग्रहणीकपाट रस । रसगन्धकयोश्चापि जातीफललवङ्गयोः । प्रत्येकं शाणमानञ्च श्लक्ष्णचूर्णीकृतं शुभम् ॥ ७४ ॥ सूर्यावर्त्तरसेनैव बिल्वपत्ररसेन च । शृङ्गाटकसमुद्भूतस्वरसेन च मर्दयेत् ॥ ७५ ॥ चण्डातपेन संशोष्य वटिकां कारयेद्भिषक् । बिल्वपत्ररसेनैव दापयेद्रक्तिकाद्वयम् ॥ ७६ ॥