रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३०९ ) केलेके पत्तेमें गोबरकी पोटली बांध उससे पिघली हुई दवाको दबा- कर पपड़ीसी बना लेवे, इसको पञ्चामृत पर्पटी कहते हैं। इस पर्पटीका पहिले दिन शहद और घृतके साथ दो रत्ती परिमाण सेवन करे; फिर प्रतिदिन क्रम क्रमसे एक एक रत्ती बढाता जाय । जब आठ या नौ रत्ती परिमाण हो जाय तब मात्राको रोक देवे; फिर एक एक रत्तीके क्रमसे घटा देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी संग्रहणी, दुष्ट बवासीर, अरुचि, वमन, बहुत दिनोंका अतिसार, ज्वर, रक्तपित्त, क्षय और नेत्ररोग नष्ट होते हैं तथा अत्यंत शुक्रकी वृद्धि होती है, वलि और पलितरोग नष्ट होता है । अग्नि दीपन होती है। इसके सेवन कर- नेसे रोगीका शरीर फिर नवयुवकके समान होजाता है। इसको पञ्चा- मृतपर्पटी कहते हैं। लोहमें मर्दन करनेके कारण इसमें पथ्यादि क्रम लोहवत् करना चाहिये ॥ ६६-६७ ॥ अग्निकुमार रस । शुद्धसूतं समं गन्धं त्रिकटु पटुपञ्चकम् । दशकं तुल्यतुल्यञ्च विजया सर्वसम्मता ॥ ६८ ॥ भावयेच्चित्रभृङ्गोत्थैस्त्रिधा च विजयाद्रवैः ! दीप्ताग्निना तु यामैकं वालुकायन्त्रगे पचेत् ॥ ६९ ॥ संचूर्ण्य चार्द्रकद्रावैर्भावयित्वा च भक्षयेत् । मधुना शाणमानन्तु रसो ह्यग्निकुमारकः । दीप्ताग्निकारकः सामग्रहणीदोषनाशनः ॥ ७० ॥ पारा, गंधक, त्रिकुटा और पांचों लवण इन सब औषधियोंको समान भाग लेवे और सबकी बराबर भांग लेवे । फिर चित्रक, भांग, भांगरा इन तीनों औषधियोंके रसमें अलग अलग तीन तीन भावना देवे । पश्चात् प्रचण्ड अग्निके द्वारा वालुकायंत्रमें एक प्रहर पकावे। फिर अद-