भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रकारकी संग्रहणीको दूर करती है । ( इसके प्रयोगमें दूधके सिवाय और खाना पीना कुछ भी न करे, यह १२ रत्ती तक क्रमशः बढ़ानी और फिर एक एक रत्तीके ही हिसाबसे घटानी चाहिये । तृषा लगे तो मौसम्मी, अनार आदिका रस लेवे; यह बिल्वपत्रके स्वरसके साथ बहुत अच्छा काम करती है ) तथा वृष्य है और सर्व प्रकारके ज्वरके दूर करती है ॥ ६२-६४ ॥ पञ्चामृतपर्पटी । अष्टौ गन्धकमाषकारसदलं लौहं तदर्द्धं शुभं, लौहार्द्धञ्च वराभ्रकं सुविमलं ताम्रं तथाभ्राद्धिकम् । पात्रे लौहमये च मर्दनविधौ चूर्णीकृतञ्चैकतो, दाव्यों बादरवह्निनातिमृदुना पाकं विदित्वा दले ६५ रम्भाया लघु ढालयेत्पट्टारियं पञ्चामृतापर्पटी, ख्याता क्षौद्रघृतान्विता प्रतिदिनं गुञ्जाद्वयं वृद्धितः । लौहे मर्दनयोगतः सुविमलं भक्षक्रिया लौहवद्, गुञ्जाष्टावथवा त्रिकं त्रिगुणितं सप्ताहमेवं भजेत्॥६६॥ नानावर्णग्रहण्यामरुचिसमुदये दुष्टदुर्नामकादौ, छर्द्यां दीर्घातिसारे ज्वरभवकलिते रक्तपित्ते क्षयेऽपि । वृष्याणां वृष्यराज्ञी वलिपलितहरा नेत्ररोगैकहन्त्री, स्वस्थं दीप्तस्थिराग्निपुनरपिनवकं रोगिदेहं करोति ६७ गन्धक ८ मासे, शुद्ध पारा ४ मासे, लोहभस्म २ मासे और अभ्रकभस्म १ मासा और तांवाभस्म ४ रत्ती लेवे । फिर इन सबको एकत्र लोहेके पात्रमें खरल करके पीछे एक लोहेकी करछीमें इसको रखकर उस करछीको बेरीके अंगारों पर रखकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब यह अच्छे प्रकारसे गल जावे तब गोबरके ऊपर एक केलेका पत्ता रखकर उसके ऊपर इसको ढाल देवे और ऊपरसे एक