भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १९९ ) तथा वातरोग नष्ट होता है । यह औषधि अत्यन्त अग्निदीपक तथा पांच प्रकारकी खाँसी, अम्लपित्त, पुरानी और असाध्य ग्रहणी, असारकता, अतिसार, श्वास, पाण्डुरोग, अरुचि और कोष्ठबद्धतादि समस्त रोग नष्ट करती है । सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे जो रोग दूर नहीं होते वह इसके सेवन करनेसे निश्चय दूर होजाते हैं । मर्त्यलोकमें यह औषधि रोगरूपी समुद्रसे पार तरनेके लिये नौकाके समान है । इसको जातीफलाद्या वटिका कहते हैं ॥ ११-१६ ॥ पूर्णकला वटी । रसं गन्धं घनं लोहं धातुकीपुष्पबिल्वकम् । विषं कुटजबीजञ्च पाठाजीरकधान्यकम् ॥ १७ ॥ रसाञ्जनं टङ्कणञ्च शिलाजतु पलं तथा । अभ्रञ्च त्रिफलं ग्राह्यं प्रत्येकं तोलकत्रयम् ॥ १८ ॥ भेकपर्णी पञ्चमूली बलाकाञ्चटदाडिमम् । शृङ्गाटं केशरं जम्बू-दधिमस्तु-जयन्तिका ॥१९॥ केशराजं भृङ्गराजं प्रत्येकं तोलकद्वयम् । द्विमाषा वटिका कार्या तक्रेण परिसेविता ॥ २० ॥ इयं पूर्णकला नाम्नी ग्रहणीगदनाशिनी । शूलघ्नी दाहशमनी वह्निदा ज्वरनाशिनी ॥ भ्रमच्छर्दिच्छेदकरी संग्रहग्रहणीं जयेत् ॥ २१ ॥ पारा, गंधक, नागरमोथा, लोहभस्म, धायके फूल, बेलगिरी, विष, इन्द्रजौ, पाठ, जीरा, धनिया, रसौत, सुहागा और शिलाजीत यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, अभ्रकभस्म और त्रिफलेये प्रत्येक औषधि तीन तीन तोले, मण्डूकपर्णी ( ब्राह्मी ), पञ्चमूल, खिरेंटी, जलपी- पल, अनार, सिंघाड़े, नागकेशर, जामुन, दहीका तोड़, जयन्ती, कुकुर- भांगरा और जलभांगरा यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेवे । इन