रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १७७ ) वीर्यस्तम्भकरश्चैव कामलापाण्डुरोगनुत् । सदा तु रमते नारीं न वीर्यं क्षीणतां व्रजेत् ॥ ४९ ॥ प्रमेहं विविधञ्चैव विविधां ग्रहणीं तथा । अनुपानविशेषेण सर्वव्याधिं विनाशयेत् ॥ ३५० ॥ इस औषधिके विधिपूर्वक सेवन करनेसे अन्तर्धातुगत ज्वर, भूतोत्थ ज्वर, श्रमजनित ज्वर, सांनिपातिक ज्वर और असाध्य ज्वर यह सब शीघ्र नष्ट होजाते हैं । जिस प्रकार सूर्योदयके होनेसे अन्धकारका समूह नष्ट होजाता है, जिस प्रकार गरुड़को देखकर सर्प दूर भाग जाते हैं उसी प्रकार इस औषधिके प्रसादसे ज्वर शीघ्र ही नष्ट होजाता है। यह अत्यंत बलकारक, पुष्टिजनक, मन्दाग्निनाशक, वीर्यस्तम्भक, कामला और पाण्डुरोगको दूर करनेवाला है। इस औषधिके सेवन करनेसे सदैव स्त्रियोंके साथ रमण करनेपर भी वीर्य क्षय नहीं होता। यह औषधि अनेक प्रकारके प्रमेह और सब प्रकारके ग्रहणीरोगको दूर करती है। यथायोग्य अनुपानके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे समस्त रोग नष्ट होते हैं। इसको बृहज्ज्वरान्तक लोह कहते हैं ॥ ३४६-३५० ॥ चूडामणि रस । मृतं सूतं प्रवालञ्च स्वर्णं तारञ्च वङ्गकम् । शुल्वं मुक्ता तीक्ष्णमभ्रं सर्वमेकत्र योजयेत् ॥ ५१ ॥ जलेन पिष्ट्वा वटिका कार्या वल्लप्रमाणतः । धातुस्थं सन्निपातोत्थं ज्वरं विषमसम्भवम् ॥ ५२ ॥ कामशोकसमुद्भूतं त्रिदोषजनितं तथा । कासं श्वासञ्च विविधं शूलं सर्वाङ्गसम्भवम् ॥५३॥ शिरोरोगं कर्णशूलं दन्तशूलं गलग्रहम् । वातपित्तसमुद्भूतं ग्रहणीं सर्वसम्भवाम् ॥ ५४ ॥