रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कण्टकारी रसोनञ्च धान्यकं जीरकद्वयम् । चन्दनं देवकाष्ठञ्च दार्बीन्द्रयवमेव च ॥ ४३ ॥ किराततिक्तकं वालं तोलकञ्च समाहरेत् । द्वितोलं मरिचं देयं भावयेदार्द्रजै रसैः ॥ ४४ ॥ माषार्द्धं भक्षयेत्प्रातर्मधुना मधुरीकृतम् । ज्वरं नानाविधं हन्ति शुक्रस्थं चिरकालजम् ॥ साध्यासाध्यविचारोऽत्र नैव कार्यो भिषग्वरैः॥४५॥ पारा, गन्धक, जावित्री और जायफल यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, सुवर्णकी भस्म ३ मासे, चांदीकी भस्म ६ मासे, लोहेकी भस्म ६ मासे, अभ्रकभस्म, शिलाजीत, भांगरा, नागरमोथा, कुकुर- भांगरा, चिरचिटा, लौंग, त्रिफला, दालचीनी, पीपलामूल, सेंधानमक, विडनमक, गिलोय, कटेरी, लहसुन, धनिया, जीरा, कालाजीरा, चंदन, देवदारु, दारुहलदी, इन्द्रजौ, चिरायता और सुगन्धवाला यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, काली मिरचोंका चूर्ण दो तोले इन सबको एकत्र करके अंदरखके रसमें भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रातःकाल इस औषधिका शहदके साथ सेवन करे । इस औषधिके प्रयोग करते समय वैद्य रोगके साध्यासाध्यका विचार नहीं करे । यह औषध अनेक प्रकारके ज्वर,शुक्रगत ज्वर और पुराने ज्वरको दूर करती है ॥ ३४०-३४५ ॥ अन्तर्धातुगतञ्चैव नाशयेन्नात्र संशयः । भूतोत्थं श्रमजञ्चापि सन्निपातज्वरन्तथा ॥ ४६ ॥ असाध्यञ्च ज्वरं हन्ति यथा सूर्योदयस्तमः । गरुडञ्च समालोक्य यथा सर्पः पलायते ॥ ४७ ॥ तथैवास्य प्रसादेन ज्वरः शीघ्रं पलायते । बलदं पुष्टिदञ्चैव मन्दाग्निनाशनं परम् ॥ ४८ ॥