भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( २३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सिन्धूद्भवं सकर्पूरं विडङ्गं.चित्रकं विषम् ॥ ४८ ॥ पारदं गन्धकञ्चैव तोलमानं प्रदापयेत् । तोलद्वयं त्रिवृच्चूर्णं लवंगं तच्चतुर्गुणम् ॥ ४९ ॥ जातीकोषफलञ्चैव तत्समं तु वराङ्गकम् । सर्वेषामर्द्धभागन्तु विडकं तत्र मिश्रयेत् ॥ ५० ॥ सर्वमेकीकृतं यद्यत् त्रुटिचूर्णञ्च तत्समम् । भावना च प्रदातव्या छागीदुग्धेन सप्तधा ॥ ५१ ॥ मातुलुङ्गरसैः पश्चाद्भावयेत्सप्तवारकम् । छायाशुष्कां वटीं कृत्वा भक्षयेद्दशरक्तिकाम् ॥५२॥ कांतलोहभस्म ३ कर्ष, अभ्रकभस्म, तांबेकी भस्म, सोनामाखी और रूपामाखीकी भस्म, यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष लेवे। सोनाभस्म, चांदीभस्म, सुहागा, बारहसिंगेके सींगकी भस्म, गजपीपल, दंतीकी जड़, कालीमिरच, तेजपात, अजवायन, सुगन्धवाला, नागरमोथा, सोंठ, धनिया, सेंधानामक, कपूर, वायविडंग, चित्रक, विष, पारा और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, निसोधका चूर्ण दो तोले, लौंग, जावित्री, जायफल और दालचीनी यह प्रत्येक आठ आठ तोले, सब औषधियोंसे आधा भाग विडनमक और सब औषधियोंके समान छोटी इलायचियोंका चूर्ण इन सब औषधियोंको एकत्र करके बकरीके दूधकी सात तथा बिजौरे नींबूके रसकी सात भावना देकर छायामें सुखा दश दश रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करे ॥ ४६–५२ ॥ मन्दानलं संग्रहणीं प्रवृद्धामामानुबन्धीं क्रिमि- पाण्डुरोगम् । छर्द्यम्लपित्तं हृदयामयञ्च गुल्मो- दरानाहभगंदरं च ॥५३॥ अर्शांसि वै पित्तकृता- नशेषान् सामं सशूलाष्टकमेव हन्ति । साजीर्ण-

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