भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २२८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दूसरा महाराजनृपतिवल्लभ-सोनामाखी, लोह, अभ्रक, वंग, चांदी और सोना इन सबकी भस्म, पीपलामूल, अजवायन, दालचीनी, तांबा- भस्म, सोंठ, सुहागा, सेंधानमक, सुगन्धवाला, नागरमोथा, धनिया, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, काकड़ासिंगी और कपूर यह प्रत्येक औषधि एक एक मासा, हींग २ मासे लेवे; कालीमिरच ४ मासे, जावित्री, लौंग और तेजपात यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे । शंखकी भस्म और वायविडंग चार चार मासे, विष २ मासे, छोटी इलायचीके बीज ६। कर्ष और विडनमक २ कर्ष लेवे । इन सबको बकरीके दूधमें पीसकर चार चार रत्तीकी गोलियां बना लेवे । प्रतिदिन एक गोली खाये तो आनाह और ग्रहणी रोग दूर हो, यह महाराज- नृपतिवल्लभ पहिले कहे महाराजनृपतिवल्लभके समान गुणकारक है । इसको महादेवजीने निर्माण किया है ॥ १५६-१६१ ॥ इति ग्रहणीरोगचिकित्सा समाप्त । अथार्शोऽधिकार । चक्रेश्वर रस । चतुर्भागं शुद्धसूतं पञ्च टंकणमभ्रकम् । त्रिदिनं भावयेद्धर्मे द्रवैः श्वेतपुनर्नवैः ॥ १ ॥ द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं वातदुर्नामशान्तये । सिद्धश्चक्रेश्वरो नाम रसश्चार्शःकुलान्तकः ॥ २ ॥ शुद्ध पारा ४ भाग, सुहागा और अभ्रकभस्म पांच पांच भाग इन सबको एकत्र करके सफेद विषखपरेके रसमें तीन दिनतक धूपमें खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन कर- नेसे वातजन्य अर्शरोग दूर होता है, यह चक्रेश्वर रस अर्शकुलनाशक है । (चक्रेश्वरमें पारदभस्म या रससिंदूर पारेके स्थानमें डालना चाहिये, अथवा द्विगुण गंधक मिलाकर पारा डालना चाहिये ) ॥ १ ॥ २ ॥