रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २३५ ) बर भिलावे लेवे, सबको एकत्र पीसकर वनजमीकंदके चार पल रसमें एक दिनतक खरल करे । इसमेंसे प्रतिदिन एक मासे औषधि लेकर घृतके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे असाध्य अर्शरोग, कुष्ठरोग और मृत्युजनक घोर रोग भी शीघ्र ही नष्ट हो जात हैं; इसको महादेवने कहा है ॥ २८-३० ॥ अष्टांग रस । गन्धं रसेन्द्रं मृतलौहकिट्टं फलत्रयं व्यूषणवह्नि- भृङ्गम् । कृत्वा समं शाल्मलिका गुडूचीरसेन यामत्रितयं विमर्द्य । निष्कप्रमाणं गदितानुपानैः सर्वाणि चार्शांसि हरेद्रसस्य ॥ ३१ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अर्शोऽधिकारः । गन्धक, पारा, लोहेका मण्डूर, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मरिच; पीपल, चीतेकी जड़ और भांगरा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर सेमल और गिलोयके रसमें तीन प्रहर खरल करके चार मासे औषधि यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी बवा- सीर दूर होती है । इसको अष्टांगरस कहते हैं ॥ ३१ ॥ इति अर्शोऽधिकार समाप्त । अथ अजीर्णाधिकार । महोदधि वटी । ऐकैकं विषसूतञ्च जातीटंकं द्विकं द्विकम् । कृष्णात्रिकं विश्वषट्कं गन्धं कापर्दकं द्विकम् ॥ १॥ देवपुष्पं बाणमितं सर्वं संमर्द्य यत्नतः । महोदधिवटी नाम्ना नष्टमग्निं प्रदीपयेत् ॥ २ ॥