भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अर्शसश्चानुलोम्यार्थं हताग्निबलवर्द्धनम् । रक्तिकाद्वितयं खादेत्कुष्ठादिरहितो नरः ॥ २५ ॥ मैनशिल और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेवे । फिर भांगरेके रसकी सात भावना देकर घी और शहदमें खरल करके दो रत्ती परिमाण सेवन करनेसे बवासीर रोग नष्ट होता है । तथा मंदाग्नि दीप्त होती है और कुष्ठादि रोग दूर होते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ जातीफलादि वटी । जातीफलं लवङ्गञ्च पिप्पली सैन्धवन्तथा । शुण्ठीधूस्तूरबीजञ्च दरदं टङ्कणं तथा ॥ २६ ॥ समं सर्वं विचूर्ण्याथ जम्भीराम्भसा विमर्दयेत् । जातीफलवटिकेयमर्शोऽग्निमान्द्यनाशिनी ॥ २७ ॥ जायफल, लौंग, पीपल, सेंधानमक, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंगरफ और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे बवासीर और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको जातीफलादि वटी कहते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥ पञ्चानन वटी । मृतसूताभ्रलोहानि मृतार्कगन्धकैः सह । सर्वाणि समभागानि भल्लातं सर्वतुल्यकम् ॥ २८ ॥ वन्यसूरणकन्दोत्थैर्द्रवैः पलप्रमाणतः । मर्दयेद्दिनमेकञ्च माषमात्रं पिबेद् घृतैः ॥ २९ ॥ भक्षणाद्धन्ति सर्वाणि चार्शांसि च न संशयः । असाध्येष्वपि कर्तव्या चिकित्सा शंकरोदिता ॥ कुष्ठरोगं निहन्त्याशु मृत्युरोगविनाशिनी ॥३०॥ पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, लोहेकी भस्म, तांबेकी भस्म और शुद्ध गंधक इन सब औषधियोंको समान भाग लेवे और सबके बरा-