रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २३३ ) मानकन्द, जमींकंद, भिलावे, निसोध, दन्तीमूल, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, तेजपात, दालचीनी और इलायची यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबके बराबर लोहा लेवे; इन सबको एकत्र करके जलमें पीसकर गोली बना लेवे । प्रतिदिन इस- मेंसे यथामात्रानुसार उचित अनुपानके साथ सेवन करे तो बवासीर नष्ट होती है ॥ २० ॥ चंचुकुठार रस । रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं भागयुग्मकम् । दन्तित्रिकटुकुष्ठैकं षड्भागं लाङ्गलस्य च ॥ २१ ॥ क्षारसैन्धवटङ्गानां प्रत्येकं भागपञ्चकम् । गोमूत्रस्य च द्वात्रिंशत्स्नुहीक्षीरं तथैव च ॥ २२ ॥ यावच्च पिण्डितं सर्वं तावन्मृद्वग्निना पचेत् । माषद्वयं ततः खादेद्दिवास्वप्नादि वर्जयेत् । रसश्चञ्चुकुठारोऽयमर्शासां कुलनाशनः ॥ २३ ॥ पारा दो भाग,गंधक दो भाग और लोहेकी भस्म दो भाग लेवे; सोंठ, मरिच, पीपल, दंतीकी जड़, कूठ और कलिहारी यह प्रत्येक औषधि छः छः भाग लेवे; जवाखार, सेंधानमक और सुहागा यह प्रत्येक पांच पांच भाग, गोमूत्र और थूहरका दूध प्रत्येक बत्तीस २ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके मंद मंद अग्निसे तब- तक पकावे जबतक कि औषधिका गोला न हो जाय । प्रतिदिन इस- मेंसे दो मासे औषधि खाये और इसपर दिनमें सोना आदि त्याग देवे । यह चंचुकुठार रस बवासीरको समूल नष्ट करता है ॥२१-२३॥ शिलागन्धक वटक । शिलागन्धकयोश्चूर्णं पृथग्भृङ्गरसाऽऽप्लुतम् । सप्ताहं भावयेत्सर्पिर्मधुभ्याञ्च विमर्दयेत् ॥२४॥