रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 258, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वायविडंग, चीतेकी जड़, सोंठ, मरिच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, देवदारु, चव्य, चिरायता, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, वच, सोनामाखी भस्म, सेंधानमक, जवाखार, सज्जीखार, हल्दी, दारु- हल्दी, धनिया, गजपीपल और अतीस यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष लेवे, शिलाजीत ८ पल लेवे, शुद्ध गूगल २ पल, लोहा २ पल, मिश्री ४ पल, वंशलोचन १ पल, दन्तीकी जड़ १ पल, निसोथ १ पल, दालचीनी १ पल, इलायची १ पल और तेजपात १ पल लेवे; इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गोली बना लेवे । इस चन्द्रप्रभा गुटिकाके सेवन करनेसे छः प्रकारकी बवासीर, भगन्दर, कामला और पांडुरोग नष्ट होते हैं । मंदाग्नि नष्ट होकर अग्नि दीप्त होती है । पित्त, कफ और वातजन्य रोग नष्ट होते हैं । तथा नाड़ीगत व्रण, मर्मगत व्रण, ग्रंथि, अर्बुद, रसौली, विद्रधि, राजयक्ष्मा, प्रमेह, भगन्दर, प्रदर, शुक्रक्षय, पथरी रोग, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रप्रवाह और उदरामय प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् तक्र, दहीका तोड़, बकरीका दूध, जंगल प्रदेशके जीवोंका मांस, दूध अथवा शीतल जल पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे हाथीके समान बल; घोड़ेके समान गतिशक्ति, गरुड़के समान दृष्टिशक्ति, सूअरके समान श्रवणशक्ति, कामदेवके समान कांति और बृहस्पतिके समान बुद्धिशक्ति उत्पन्न होती है । इस औषधिके सेवन करनेपर पान भोजन, शीतल वायुका सेवन, सूर्यकी धूप और स्त्री प्रसंग आदिका कुछ नियम नहीं.है । इससे वीर्यदोष और अत्यंत दारुण प्रमेह रोग नष्ट होता है तथा वलीपालित रोग नष्ट होकर वृद्ध भी तरुणताको प्राप्त होता है । इसको चन्द्रमाके प्रसादसे प्राप्त हुई चन्द्रप्रभा वटी कहते हैं ॥ १२-१९ ॥ माणाद्य लोह । माणशूरणभल्लातत्रिवृद्दन्तीसमन्वितम् । त्रिकत्रयसमायुक्तं लौहं दुर्नामनाशनम् ॥ २० ॥