रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २३७ ) जवाखार १ कर्ष, सज्जी १ कर्ष और सुहागा १ कर्ष इन सब औषधि- योंको एकत्र खरल करके सम्हालूके रसमें एक दिन भावना देकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि दूर होती है । इसको वड- वानल रस कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ हुताशन रस । गन्धेशटंकणैकैकं विषमत्र त्रिभागिकम् । अष्टभागन्तु मरिचं जम्भाम्भोमर्दितं दिनम् ॥ ७ ॥ तद्वटीं मुद्गमानेन कृत्वाऽद्रेण प्रयोजयेत् । शूलारोचकगुल्मेषु विषूच्यां वह्निमान्द्यके ॥ अजीर्णे सन्निपातादौ शैत्ये जाड्ये शिरोगदे ॥ ८ ॥ गन्धक, पारा और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, विष ३ भाग, काली मिरच ८ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र जम्बीरी नींबूके रसमें एक दिन अच्छे प्रकारसे खरल करके मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरकके रसके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे शूल, अरुचि, गुल्म, विषूचिका, अग्निमान्द्य, अजीर्ण, सन्निपात, शैत्य, जडता और शिरोरोग नष्ट होता है । इसको हुताशन रस कहते हैं ॥ ७ ॥ ८ ॥ बृहत् हुताशन रस । एकद्विकद्वादशभागयुक्तं योज्यं विषं टंकणमूष- णञ्च । हुताशनो नाम हुताशनस्य करोति वृद्धिं कफजिन्नराणाम् ॥ ९ ॥ विष एक भाग, सुहागा दो भाग और कालीमिरच १२ भाग लेवे; इन सबको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे अग्निकी वृद्धि होकर कफ नष्ट होता है ॥ ९ ॥ ९