भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अमृतकल्प वटी । शुद्धौ पारदगन्धौ च समानौ कज्जलीकृतौ । तयोरर्द्धं विषं शुद्धं तत्समं टंकणं भवेत् ॥ १० ॥ भृङ्गराजद्रवैर्भाव्यं त्रिदिनं यत्नतः पुनः । मुद्गप्रमाण! वटिकाः कर्त्तव्या भिषजां वरैः ॥ ११ ॥ वटीद्वयं हरेच्छूलमग्निमान्द्यं सुदारुणम् । अजीर्णं जरयत्याशु धातुपुष्टिं करोति च ॥ १२ ॥ नानाब्याधिहरा चेयं वटी गुरुवचो यथा । अनुपानविशेषेण सम्यग्गुणकरी भवेत् ॥ १३ ॥ शुद्ध पारा १ भाग, गन्धक १ भाग, विष १ भाग और सुहागा १ भाग लेवे । पहले पारे गंधककी कज्जली कर ले; फिर इन सब औष- धियोंको एकत्र करके भांगरेके रसमें तीन भावना देकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे। इनमेंसे दो गोली नित्य खानेसे शूल, अग्निकी मंदता और अजीर्ण रोग नष्ट होते हैं, धातुकी वृद्धि होती है और अनेक प्रकारके रोग नष्ट होते हैं । यह गुरुदेवके वचनानुसार अनुपानविशे- षोंके साथ सेवन करनेसे श्रेष्ठ गुणोंको उत्पन्न करती है ॥ १०-१३ ॥ अग्निकुमार रस । रसेन्द्रगन्धौ सह टंकणेन समं विषं योज्यमिह त्रिभागम् । कपर्दशंखाविह नेत्रभागौ मरीचमत्रा- ष्टगुणं प्रदेयम् ॥ १४ ॥ सुपक्वजम्बीररसेन घृष्टः सिद्धो भवेदग्निकुमार एषः । विषूचिकाजीर्णसमी- रणार्त्ते दद्याद्धि वह्नौ ग्रहणीगदे च ॥ १५ ॥