भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (२३९) पारा, गंधक,सुहागा प्रत्येक एक एक भाग, विष तीन भाग,शंखकी भस्म २ भाग, कौड़ीकी भस्म २ भाग और काली मिरच ८ भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र करके अच्छे प्रकारसे पके हुए जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे विषूचिका, अजीर्ण, वातरोग और ग्रहणी रोग नष्ट होते हैं। इसको अग्निकुमाररस कहते हैं ॥ १४ ॥ १५ ॥ बृहदग्निकुमार रस। शुद्धसूतं द्विधा गन्धं गन्धतुल्यञ्च टंकणम् । फलत्रयं यवक्षारं व्योषं पञ्चपटूनि च ॥ १६ ॥ द्वादशैतानि सर्वाणि रसतुल्यानि दापयेत् । संमर्द्य सप्तधा सर्वं भावयेदार्द्रकद्रवैः ॥ १७ ॥ संशोष्य चूर्णयित्वा तु भक्षयेदार्द्रकाम्बुना । शाणमात्रं वयो वीक्ष्य नानाऽजीर्णप्रशान्तये ॥ रसश्चाग्निकुमारोऽयं महेशेन प्रकाशितः ॥ १८ ॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, सुहागा २ भाग, त्रिफला, जवा- खार, त्रिकुटा और पांचों लवण यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके अदरखके रसकी सात भावना देवे और धूपमें सुखा लेवे। पश्चात् इसका चूर्ण करके रोगीकी अवस्थाको देखकर चार मासे परिमाण अदरखके रसके साथ सेवन करे। अनेक प्रकारके अजीर्णोंको दूर करनेवाली यह औषधि स्वयं महादेवने कही है ॥ १६-१८ ॥ महाग्निकारकश्चै कालभास्करतेजसाम् । अग्निमान्द्यभवान् रोगान् शोथं पाण्ड्वामयं जयेत् १९ दुर्नामग्रहणीसामरोगान् हन्ति न संशयः । यथेष्टाहारचेष्टस्य नास्त्यत्र नियमः क्वचित् ॥२०॥