भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इससे अत्यन्त बढ़ी हुई मंदाग्नि,शोथ, पाण्डुरोग, बवासीर,संग्रहणी और आमरोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेपर यथेष्ट आहार विहार करे, इसपर किसी प्रकारका नियम नहीं है । यह प्रलयके सूर्यके समान अग्निको अत्यंत प्रदीप्त करता है ॥ १९ ॥ २० ॥ व्योषं जातीफले द्वे च लवङ्गञ्च वरांगकम् । पत्रं शृंगीं कणा टङ्कं यमानी जीरकद्वयम् ॥ २१ ॥ सैन्धवञ्च विडं हिङ्गु रसं गन्धञ्च रौप्यकम् । लोहमभ्रं समं सर्वं जम्बीररसमर्दितम् ॥ २२ ॥ चतुर्गुञ्जां वटीं कृत्वा खादेदजीर्णशान्तये । अत्यग्निकारकश्चायं रसश्चाग्निकुमारकः ॥ २३ ॥ संग्रहग्रहणीञ्चैव वातपित्तकफोद्भवाम् । नाशयेदामदोषञ्च त्रिदोषजनितञ्च यत् ॥ शूलदोषं विषूचीञ्च भास्करस्तिमिरं यथा ॥ २४ ॥ अपर बृहदग्निकुमार रस—सोंठ,पीपल,कालीमिरच, जायफल,जावित्री, लौंग, दालचीनी, तेजपात, काकड़ासिंगी, पीपल, सुहागा, अजवायन, जीरा, कालाजीरा, सेंधानमक, विडनमक, हींग, पारा, गंधक, रूपा भस्म, लोहभस्म और अभ्रकभस्म इन सब द्रव्योंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । अनेक प्रकारके अजीर्णोंको शमन करनेके लिये इन गोलियोंका सेवन करे । यह अग्निको अत्यन्त दीपन करता है । इसके सेवन करनेसे वातज, पित्तज और कफज ग्रहणी रोग नष्ट होता है तथा आमदोष, त्रिदोषजरोग, शूल और विषूचिका रोग ऐसे नष्ट होते हैं जिसप्रकार सूर्योदयसे अन्धकारका समूह नष्ट होता है । इसको अपर बृहदग्निकुमार रस कहते हैं ॥ २१-२४ ॥