भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 267

भाषाटीकासहित । ( २४१ ) बृहन्महोदधि वटी । लवंगं चित्रकं शुण्ठी जयपालं समं समम् । टंकणञ्च प्रदातव्यं वृद्धदारस्य कार्षिकम् ॥ २५ ॥ चतुर्दश भावनाश्च दन्तीद्रावैः प्रदापयेत् । निम्पाकेन त्रिधा देया वृद्धदारेण पञ्चधा ॥ २६ ॥ रसं गन्धञ्च गरल मेलयित्वा विभावयेत् । आर्द्रकस्य रसेनैव चित्रकस्य रसेन वा ॥ २७ ॥ मुद्गप्रमाणां वटिकां कृत्वा खादेद्दिने दिने । क्षुत्पिपासाकरी चेयं जीर्णज्वरविनाशिनी ॥ २८ ॥ लौंग, चित्रकमूल, सोंठ, जमालगोटे, सुहागा और विधारके बीज यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर दंतीकी जड़के रसमें चौदह भावना देवे, फिर कागजी नींबूके रसमें तीन भावना देवे, पश्चात् विधारके क्वाथकी पांच भावना देवे । फिर इसमें पारा एक कर्ष, गंधक एक कर्ष और विष एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर अदरखके रसकी सात और चित्रक जड़की सात भावना देकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इनमें से प्रतिदिन एक गोली भक्षण करे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे क्षुधा और पिपासाकी वृद्धि होती है तथा जीर्णज्वर नष्ट होता है । इसको बृहन्महोदधि वटी कहते हैं ॥ २५-२८ ॥ रामबाण रस । पारदामृतलवंगगन्धकं भागयुग्ममरिचेन मिश्रि- तम् । जातिकाफलमथार्द्धभागिकं तिन्तिडीफल- रसेन मर्दितम् ॥ २९ ॥ माषमात्रमनुपानयोगतः सद्य एव जठराग्निदीपनः। संग्रहग्रहणीकुम्भकर्णकं