रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सामवातखरदूषणं जयेत् । वह्निमान्द्यदशवक्त्र- नाशनो रामबाण इव विश्रुतो रसः ॥ ३० ॥ पारा, विष, लौंग और गंधक यह प्रत्येक एक एक भाग, काली- मिरच दो भाग, जायफल आधा भाग इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कच्ची इमलीके रसमें भावना देकर यथोचित मात्रानुसार अथवा एक मासे औषधि यथोक्त अनुपानके साथ सेवन करे तो जठराग्निकी वृद्धि होकर मंदाग्नि नष्ट होती है । इसके सेवन करनेसे कुम्भकर्णकी समान संग्रहणी, खरदूषणके समान आमवात और दशाननकी समान मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको रामबाण रस कहते हैं ॥ २९ ॥ ३० ॥ अजीर्णकण्टक रस । शुद्धसूतं विषं गन्धं समं सर्वं विचूर्णयेत् । मरिचं सर्वतुल्यञ्च कण्टकार्याः फलद्रवैः ॥ ३१ ॥ मर्दयेद्भावयेत्सर्वमेकविंशतिवारकम् । त्रिगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्वाजीर्णप्रशान्तये । अजीर्णकण्टकः सोऽयं रसो हंति विषूचिकाम्॥३२॥ शुद्ध पारा, विष और गंधक समान भाग लेकर एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर ले और सब चूर्णके बराबर काली मिरचोंका चूर्ण लेवे । सबको एकत्र कटेरीके फलोंके रसमें २१ बार भावना देकर तीन तीन रत्तीकी गोलियां बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारका अजीर्ण रोग दूर होता है तथा विषूचिका नष्ट होती है । इसको अजीर्णकण्टक रस कहते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ पाशुपत रस । कर्षं सूतं द्विधा गन्धं त्रिभागं तीक्ष्णभस्मकम् । त्रिभिर्विषं समं देयं चित्रकक्वाथभावितम् ॥ ३३ ॥