रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (२४३) धूर्त्तबीजस्य भस्मापि द्वात्रिंशद्भागसंयुक्तम् । कटुत्रयं त्रिभागं स्याल्लवंगैला च तत्समम् ॥ ३४ ॥ जातीफलं तथा कोषमर्द्धभागं नियोजयेत् । तथाऽर्द्धं लवणं पञ्च स्नुह्यर्कैरण्डतिन्तिडी ॥ ३५ ॥ अपामार्गाश्वत्थजञ्च क्षारं दद्याद्विचक्षणः । हरीतकी यवक्षारं स्वर्जिका हिंगुजीरकम् ॥ ३६ ॥ सूततुल्यं टङ्कणं च चाम्लयोगेन मर्दयेत् । भोजनान्ते प्रयोक्तव्यो गुञ्जाफलप्रमाणतः ॥ ३७ ॥ रसः पाशुपतो नाम सद्यः प्रत्ययकारकः । दीपनः पाचनो हृद्यः सद्यो हन्ति विषूचिकाम्॥३८॥ पारा १ भाग , गंधक २ भाग, लोहाभस्म ३ भाग और विष छः भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चित्रकके रसमें भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसमें ३२भाग धतूरेके बीजोंकी भस्म, त्रिकुटेका चूर्ण ३ भाग, लौंग ३ भाग, इलायची ३ भाग, जायफल आधा भाग, जावित्री आधा भाग, पांचों नमक प्रत्येक आधा आधा भाग तथा थूहर, आक, अरण्ड, इमली, चिरचिटा और पीपल इन प्रत्येकका क्षार एक एक भाग लेवे । फिर हरड़, जवाखार, सज्जी, हींग, जीरा और सुहागा यह समस्त औषधि प्रत्येक एक एक भाग मिलाकर पूर्वोक्त अम्लवर्गकी औषधियोंमें खरल करे । भोजनके पश्चात् इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि सेवन करनी चाहिये। यह औषधि तत्काल गुण- दायक है; अग्निको दीपन करनेवाली, पाचक, हृदयको हितकारी और तत्काल विषूचिका रोगको दूर करती है ॥ ३३-३८ ॥ तालमूलीरसेनैव उदरामयनाशनः । मोचरसेनातिसारं ग्रहणीं तक्रसैन्धवैः ॥ ३९ ॥