भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( २४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सौवर्चलकणाशुण्ठीयुतः शूलं विनाशयेत् । अर्शो हन्ति च तक्रेण पिप्पल्या राजयक्ष्मकम्॥४०॥ वातरोगं निहन्त्याशु शुण्ठीसौवर्चलान्वितः । शर्कराधान्ययोगेन पित्तरोगं निहन्त्ययम् ॥ ४१ ॥ पिप्पलीक्षौद्रयोगेन श्लेष्मरोगञ्च तत्क्षणात् । अस्मात् परतरो नास्ति धन्वन्तरिमतो रसः ॥४२॥ इस औषधिको मुसलीके रसके साथ सेवन करनेसे उदरामय नष्ट होता है, मोचरसके साथ सेवन करनेसे अतिसार रोग, तक्र और सेंधा- नमकके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी, कालानमक पीपल और सोंठके साथ सेवन करनेसे शूल, तक्रके साथ सेवन करनेसे बवासीर, पीपलके साथ सेवन करनेसे राजयक्ष्मा, सोंठ और काले नमकके साथ सेवन करनेसे वातरोग, मिश्री और धनियेके साथ सेवन करनेसे पित्तरोग, पीपलके चूर्ण और शहदके साथ सेवन करनेसे कफरोग तत्काल नष्ट होजाता है । इसके समान संसारमें अन्य औषध गुणकारक नहीं है । इसको पाशुपत रस कहते हैं ॥ ३९-४२ ॥ बृहच्छंखवटी । दग्धशंखस्य चूर्णं स्यात्तथा लवणपञ्चकम् । तिंतिडीक्षारकञ्चैव कटुकत्रयमेव च ॥ ४३ ॥ तथैव हिंगुकं ग्राह्यं विषपारदगन्धकम् । अपामार्गस्य वह्नेश्च क्वाथैर्निम्पाकजैर्द्रवैः ॥ ४४ ॥ भावयेत्सर्वचूर्णं तदम्लवर्गैर्विशेषतः । यावत्तदम्लतां याति गुटिकाऽमृतरूपिणी ॥ ४५ ॥ सद्यो वह्निकरी चैव भस्मकञ्च नियच्छति ।