रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जातीफलं यवक्षारं समभागं विचूर्णयेत् । आर्द्रकस्य रसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ॥ ५१ ॥ सूर्यावर्त्तरसेनैव तुलस्याः स्वरसेन च । आतपे भावयेद्वैद्यः खल्लपात्रे च निर्मले ॥ पेषयित्वा वटीं खादेद्गुञ्जाफलसमप्रभाम् ॥ ५२ ॥ सोनामाखी, पारा, गंधक, हरिताल, मैनशिल, निसोध, दंती, नागरमोथा, चित्रक, सोंठ, पीपल, मरिच, हरड़, अजवायन, काला जीरा, हींग, कुटकी, पाढ़, सेंधानमक, अजमोद, जायफल और जवा- खार इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर अदरख, सम्हालू, हुलहुल और तुलसी इन प्रत्येकके स्वरसकी सात सात भावना देवे और उत्तम खरलमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे ॥ ४९–५२ ॥ भुक्तोत्तरीये बहुभोजनान्ते मुहुर्मुहुर्वाञ्छति भोज- नानि । आमानुबन्धे च चिराग्निमान्द्ये विड्विग्रहे पित्तकफानुबन्धे ॥ ५३ ॥ शोथोदरे चार्शसि चाप्यजीर्णे शूले प्रदोषप्रभवे ज्वरे च । शस्ता वटी भक्तविपाकसंज्ञा सुखं विपाच्याशु निरस्य कोष्ठम् ॥ ५४ ॥ इस औषधिको भोजनके पश्चात् सेवन करनेसे वारंवार भोजन कर- नेकी अभिलाषा उत्पन्न होती है । आमानुबन्धी, बहुत समयकी मंदाग्नि, मलरोध, पित्त और कफका अनुबन्ध, शोथ, उदररोग, अर्श, अजीर्ण, दोषोंके प्रकोपसे उत्पन्न हुए शूल और ज्वर रोग नष्ट होते हैं । इसको भक्तविपाक वटी कहते हैं ॥ ५३ ॥ ५४ ॥