रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शृङ्गीव्योषयमानि चित्रजलदं द्वे जीरके टंकण,- मेलापत्रलवंगहिंगुकटुकीजातीफलं सैन्धवम् ॥६८॥ एतान्यार्द्रकचित्रदन्तिसुरसावासारसैर्बिल्वजैः, पत्रो- त्थैरपि सप्तधा सुविमले खल्ले विभाव्यान्यतः । खादेद्वल्लमितं तथा च सकलव्याधौ प्रयोज्या बुधै- र्विद्बन्धे कफजे त्रिदोषजनिते ह्यामानुबन्धेऽपि च ॥ ६९ ॥ मन्दाग्नौ विषमज्वरे च सकले शूले त्रिदोषोद्भवे, हन्यात्तानपि भक्तपाकवटिका भूयश्च सामं जयेत् ॥ ७० ॥ अभ्रक भस्म, पारा, गंधक, सिंग्रफ, तांबा भस्म, हरितालभस्म, मैनाशिलभस्म, वंगभस्म, त्रिफला, विष और नैपाली मैनशिल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, दंती ३ भाग, काकड़ासिंगी, त्रिकुटा, अजवायन, चित्रक, नागरमोथा, जीरा, कालाजीरा, सुहागा, इलायची, तेजपात, लौंग, हींग, कुटकी, जायफल और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग; इन सब औषधियोंको एकत्र करके अदरख, चित्रक, दंती, तुलसी, अडूसा और बेलके पत्ते इन प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देवे । इसको सब प्रकारके रोगोंमें तीन रत्ती परिमाण प्रयुक्त करनी चाहिये । कफजन्य मलरोध, त्रिदोषजनित आमानुबन्ध, अग्निमांद्य, विषमज्वर और त्रिदोषजनित शूल रोगमें यह औषधि अतीव हितकारी है । इसको भक्तपाक वटी कहते हैं॥६८-७०॥ लवङ्गादि वटी । लवंगशुण्ठीमरिचानि भृष्टसौभाग्यचूर्णानि समानि कृत्वा । भाव्यान्यपामार्गहुताशवारा प्रभूत- मांसादिकजारणाय ॥ ७१ ॥