भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( २४९ ) ज्वालानल रस । क्षारद्वयं सूतगन्धौ पञ्चकोलमिदं समम् । सर्वतुल्या जया देया तदर्द्धं शिग्रुवल्कलम् ॥ ६४ ॥ एतत्सर्वं जयाशिग्रुवह्निमार्कवजै रसैः । भावयेत्त्रिदिनं घर्मे ततो लघुपुटे पचेत् ॥ ६५ ॥ भावयेत्सप्तधा चार्द्रद्रवैर्ज्वालानलो भवेत् । पाचनो दीपनो हृद्यश्चोदरामयनाशनः ॥ ६६ ॥ जवाखार, सज्जीखार, पारा, गंधक और पंचकोल यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर भांग लेवे, भांगसे आधा भाग सहिंजनेकी छाल लेवे। इन सबको एकत्र करके भांग, संहजना, चित्रक और भांगरा इन प्रत्येकके रसकी तीन दिनतक भावना देवे । फिर धूपमें सुखाकर लघुपुटमें पकावे । फिर अदरखके रसमें सात वार भावना देवे । यह औषधि अत्यंत पाचक, अग्निप्रदीपक, हृदयको हितकारी और उदररोग को दूर करती है । इसको ज्वालानल रस कहते हैं ॥ ६४-६६ ॥ अमृतावटी । अमृतवराटमरिचैर्द्विपञ्चनवभागयोजितैः क्रमशः । वटिका मुद्गसमाना कफत्रिदोषवह्निमांद्यहारिणी ॥६७॥ शुद्ध विष २ भाग, कौड़ीकी भस्म ५ भाग, काली मिरच ९ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें पीसकर मूंगकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफादि त्रिदोष और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसको अमृतावटी कहते हैं ॥ ६७ ॥ बृहद्भक्तपाक वटी । अभ्रं पारदगन्धकौ सदरदौ ताम्रञ्च तालं शिला, वङ्गञ्च त्रिफला विषञ्च कुनटी भागास्त्रयो दन्तिनः ।