रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रसिद्धो रसस्तु मन्थानकभैरवोक्तः ॥ माषद्वयं सैन्धवतक्रपीतमेतत्सुधन्यं खलु भोजनान्ते ॥ ६१ ॥ पारा १ पल, गंधक २ पल, तांबा भस्म आधा पल, लोहाभस्म आधा पल इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर अग्निके योगसे गला लेवे और एरण्डके पत्तोंपर ढाल देवे, जब यह पर्पटीके समान हो जाय तब पीसकर चूर्ण कर लेवे । फिर जम्भीरी नींबूके १०० पल रसमें यह चूर्ण डालकर मंद मंद अग्निसे पकावे, फिर पंचकोल, बिजौरा नींबू और अमलवेत इन प्रत्येकके एकसौ पल रसकी भावना देवे । पश्चात् इसमें सुहागा १६ तोला, संचरनमक सबसे आधा और काली मिरच सबके बराबर मिलाकर चनाखारकी सात भावना देवे । पश्चात् इसकी दो दो मासेकी गोली बनाकर नित्य एक गोली तक्र और सेंधानमकके साथ भोजनके अंतमें सेवन करे ॥ ५८-६१ ॥ गुरूणि मांसानि पयांसि पिष्टं घृतानि सेव्यानि फलानि चापि । मात्रातिरिक्तान्यपि सेवितानि यामद्वयाज्जारयति प्रसिद्धः ॥६२॥ कार्श्यस्थौल्य- निबर्हणो गरहरः सामार्त्तिनिर्णाशनो, गुल्मप्लीह- निषूदनो ग्रहणिकाविध्वंसनः संसनः। वातश्लेष्म- निबर्हणः श्रमहरः शूलार्तिशूलापहो, वातग्रन्थि- महोदरापहरणः क्रव्यादनामा रसः ॥ ६३ ॥ भारी पदार्थ, मांस, दूध, मिष्टान्न और पक्वान्न, घृत और फल खूब पेट भरकर भोजन करके इस औषधिके सेवन कर लेने पर दो प्रहरमें समस्त जीर्ण हो जाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे कृशता, स्थूलता, विषदोष, आमरोग, गुल्म, प्लीहा, संग्रहणी, वात- कफज रोग, श्रम, शूल, वातज ग्रंथि और उदररोग नष्ट होते हैं । इसको क्रव्याद रस कहते है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥