रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शूल,कुष्ठ,अम्लपित्त,प्रबल वातरोग, मंदाग्नि और कोष्ठगत वात रोगोंको शीघ्र ही नष्ट करती है । इसको बृहल्लवंगादि वटी कहते हैं ॥७२-७५॥ जातीफलादि वटी । जातीफलं लवंगञ्च पिप्पलीं सिन्धुरामृतम् । शुण्ठीधूस्तूरबीजञ्च दरदं टंकणन्तथा ॥ ७६ ॥ समं सर्वं समाहृत्य जम्भाम्भसा विमर्दयेत् । वल्लमाना वटी कार्या चाग्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ७७॥ जायफल, लौंग, पीपल, सम्हालूके पत्ते, विष, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंग्रफ और सुहागा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्बीरी नींबूके रसमें भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलि- योंके यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे अग्निमांद्य रोग नष्ट होता है । इसको जातीफलादि वटी कहते हैं ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ शंखवटी । सार्धकर्षं रसेन्द्रस्य गन्धकस्य तथैव च । विषं कर्षत्रयं दद्यात्सर्वतुल्यं मरीचकम् ॥ ७८ ॥ दग्धशंखञ्च तत्तुल्यं पञ्च कर्षाणि नागरात् । स्वर्जिका रामठकणा सिन्धुसौवर्चलं विडम् ॥७९ ॥ सामुद्रमौद्भिदञ्चैव भावयेन्निम्बुकद्रवैः । वटी ग्रहण्यम्लपित्तशूलघ्नी वह्निदीपनी ॥ ८० ॥ वह्निमान्द्यकृतान् रोगान्सामदोषं विनाशयेत् ॥८१॥ पारा १॥ तोले, गन्धक १॥ तोले, विष ३ तोले, काली मिरच ६ तोले, शंखकी भस्म ६ तोले, सोंठ ५ तोले, सज्जी ५ तोले, हींग ५ तोले, पीपल ५ तोले, सेंधानमक ५ तोले, कालानमक ५ ताल,