रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 279, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २५३ ) विडनमक ५ तोले, सामुद्रक नमक ५ तोले और सांभर नमक ५ तोले इन सब औषधियोंमें एकत्र अच्छे प्रकारसे कागजी नींवूके रसकी भावना देकर गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे संग्रहणी, अम्लपित्त और शूल रोग नष्ट होते हैं । अग्नि दीप्त होती है, मन्दाग्निजन्य रोग और आमदोष नष्ट होते हैं । इसको शंखभस्म- वटी अथवा शंखवटी कहते हैं ॥ ७८-८१ ॥ चिन्तामणि रस । रसं गन्धो मृतं ताम्रं मृतमभ्रं फलत्रयम् । त्र्यूषणं दन्तिबीजञ्च सर्वं खल्ले विमर्दयेत् ॥८२॥ द्रोणपुष्पीरसैश्चापि भावयेच्च पुनः पुनः । अस्य मात्रा प्रदातव्या गुञ्जैका वा त्रिगुञ्जिका ॥८३॥ चिन्तामणिरसो ह्येष चाजीर्णे शस्यते सदा । आमवातं ज्वरं हन्ति सर्वशूलनिषूदनः ॥८४॥ पारा, गन्धक, तांबा भस्म, अभ्रक भस्म, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, जमालगोटा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर गूमाके रसकी सात भावना देवे, पश्चात् एक रत्तीसे तीन रत्तीतककी गोली बनावै । यह औषधि अजीर्ण रोगमें अतीव हितकारी है । इससे आमवात, ज्वर और सब प्रकारका शूल नष्ट होजाता है । इसको चिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ८२-८४ ॥ प्रदीपन रस । रसनिष्कं गन्धनिष्कं निष्कमात्रं प्रदीपनम् । मानमर्द्धं प्रदातव्यं चुल्लिका लवणं भिषक् ॥ ८५ ॥ मर्दयित्वा प्रदातव्यमथास्य माषमात्रकम् । अजीर्णे चाग्निमान्द्ये च दातव्यो रसवल्लभः ॥ ८६ ॥