रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा आधा तोला, गन्धक आधा तोला, विष आधा तोला और चूलही लवण ३ मासे इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एक मासे परिमाण जलके साथ सेवन करे तो अजीर्ण रोग और अग्निमांद्य रोग नष्ट होते हैं । इसको प्रदीपन रस कहते हैं ॥ ८५-८६ ॥ विजय रस । रसस्यैकं पलं दत्त्वा नागञ्च गन्धकं पलम् । क्षारत्रयं पलं देयं लवंगं पलपञ्चकम् ॥ ८७ ॥ दशमूलीजयाचूर्णं तद्द्रवेण तु भावयेत् । चित्रकस्य रसेनाथ भृङ्गराजरसेन तु ॥ ८८ ॥ शिग्रुमूलद्रवैश्चापि ततो भाण्डे निरुध्य च । याममात्रं पचेदग्नौ मर्दयेदार्द्रकद्रवैः ॥ ८९ ॥ ताम्बूलीपत्रसंयुक्तं खादेन्निष्कमितं सदा ॥ ९० ॥ पारा १ पल, सीसा भस्म १ पल, गन्धक १ पल, जवाखार १ पल, सज्जी १ पल, सुहागा १ पल, लौंग ५ पल, दशमूल ५ पल, भांगका चूर्ण ५ पल इन सब औषधियोंको एकत्र करके चीतेकी जड़, भांगरा और सहिंजनेकी जड़ इन प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देवे । पश्चात् एक हांडीमें रखकर उसका मुख बंद करके एक प्रहर- तक अग्नि देवे । जब अपने आप शीतल होजाय तब उसको अदरखके रसमें खरल करके चार चार मासे पानमें रखकर सेवन करना चाहिये । इसको विजय रस कहते हैं ॥ ८७-९० ॥ महाभक्तपाक वटी । माक्षिकं रसगन्धौ च हरितालं मनःशिला । गगनं कान्तलौहञ्च सर्वमेतच्च कार्षिकम् ॥ ९१ ॥