रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३५६ ) त्रिवृद्दन्ती वारिवाहं चित्रकञ्च महौषधम् । पिप्पलीमरिचं पथ्या यवानी कृष्णजीरकम् ॥ ९२॥ रामठं कटुकापानी सैन्धवं साजमोदकम् । जातीफलं यवक्षारं समभागं विचूर्णयेत् ॥ ९३ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च । सूर्यावर्तरसेनैव ज्योतिष्मत्या रसेन च ॥ ९४ ॥ आतपे भावयेद्वैद्यः कृत्वा गुञ्जामितां वटीम् । भक्षयेत्तां वटीं प्राज्ञो लवङ्गेन नियोजिताम् ॥ ९५॥ भुक्तोत्तरीये बहुभोजनान्ते आमानुबन्धे चिरवह्निमान्द्ये । विड्विग्रहे वातकफानुबन्धे शोथोदरानाहगदेऽप्यजीर्णे । शूले त्रिदोषप्रभवे ज्वरेच शस्ता वटी भक्तविपाकसंज्ञा ॥ ९६ ॥ सोनामखी भस्म, पारा, गंधक, हरताल भस्म, मैनशिल, अभ्रकभस्म और कान्तलोह भस्म, यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला; निसोध, दंतीकी जड़, नागरमोथा, चीतेकी जड़, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, अजवायन, काला जीरा, हींग, कटुकापानी ( मकोय ), सेंधानमक, अजमोद, जायफल और जवाखार इन सब औषधियोंको भी एक एक तोला- लेकर अदरख, सम्हालू, हुलहुल और मालकांगुनी इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । भोजनके अन्तमें, अथवा बहुत भोजन करनेपर, आमके रोगोंमें, बहुत दिनोंके अग्निमांद्यरोगमें, मलावरोध, वात और कफ संबन्धी रोगोंमें, शोथरोगमें, उदररोगमें, आनाहरोगमें, अजीर्णरोगमें, शूल और त्रिदोषज रोगमें, तथा ज्वर इन सब रोगोंमें यह औषधि लवंगोंके साथ खाना अतीव हितकारी है । इसको महाभक्तपाक वटी कहते हैं ॥ ९१-९६ ॥