रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रसराक्षस । ताम्रं पारदगन्धकं त्रिकटुकं तीक्ष्णञ्च सौवर्चलं, खल्ले मर्द्य दिनं निधाय सिकतात्कुम्भेषु यामं ततः । स्विन्नं तेष्वपि रक्तशाकिनिभवं क्षारं समं भावये- देकीकृत्य च मातुलुंगकजलैर्नाम्ना रसो राक्षसः॥९७॥ तांबाभस्म, पारा, गंधक, सोंठ, पीपल, मरिच, तीक्ष्ण लोहभस्म, कालानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर वालुकासे भरे हुए कुम्भमें स्थापन करके एक प्रहर तक पकावे । जब शीतल हो जाय तब उसमेंसे औषधिको निकालकर उसमें एक भाग लाल पुनर्नवेका खार मिलाकर बिजौरे नींबूके रसकी सात भावना देवे । इसको यथोचित मात्रानुसार रोगीको सेवन करावे । इसको राक्षस रस कहते हैं ॥ ९७ ॥ त्रिफला लोह । त्रिफलामुस्तवेल्लैश्च सितया कणया समम् । खरमञ्जरिबीजैश्च लौहं भस्मकनाशनम् ॥ ९८ ॥ हरड़, बहेडा, आमला, नागरमोथा, वायविडंग, मिश्री, पीपल, चिर- चिटेके बीज यह प्रत्येक एक एक भाग और सबकी बराबर लोहभस्म इन सबको एकत्र पीसकर गोली बनाकर प्रयोग करनेसे भस्मक रोग नष्ट होता है ॥ ९८ ॥ विषूच्यञ्जन । अपामार्गस्य पत्रं च मरिचञ्च समं समम् । अम्लेरोलीयुतं पिष्टमञ्जनात्सूचिकां जयेत् ॥ ९९ ॥ चिरचिटेके पत्ते और कालीमिरचोंको समान भाग लेकर चांगेरीके रसमें घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे विषूचिका रोग नष्ट होता है ॥ ९९ ॥