भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ३५८ ) रसेंद्रसारसंग्रह । जवाखार, सज्जीखार, पारा, गंधक, सेंधानमक, विडनमक और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे । इमलीका खार चार तोले, शंखकी भस्म चार तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र कागजी- नींबूके रसमें सात वार भावना देकर पश्चात् उसमें लोहा भस्म १ भाग, हींग १ भाग और सुहागा १ भाग मिलाकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । यह गोली अग्निको अतिशय दीपन करती है । शूलको नष्ट करती है, पाचक तथा श्वास, खांसी और क्षयरोगको नष्ट करती है। मंदा- ग्निको दीपन करनेवाली, वातव्याधि, उदररोग, तृषा, कृमि और समस्त दुष्ट रोग नाशक है । इसको शंखवटी कहते हैं ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ इति अजीर्णरोगचिकित्सा समाप्त । अथ क्रिमिरोगचिकित्सा । क्रिमिकालानल रस । विडंगं द्विपलञ्चैव विषचूर्णं तदर्द्धकम् ॥ लौहचूर्णं तदर्द्धञ्च तदर्द्धं शुद्धपारदम् ॥ १ ॥ रसतुल्यं शुद्धगन्धं छागीदुग्धेन पेषयेत् । छायाशुष्कां वटीं कृत्वा खादेत्षोडशरक्तिकाम्॥२॥ धान्यजीरातुपानेन नाम्ना कालानलो रसः । उदरस्थं क्रिमिं हन्याद्ग्रहण्यर्शःसमन्वितम् ॥ ३ ॥ अग्निदः शोथशमनो गुल्मप्लीहोदराञ्जयेत् । गहनानन्दनाथेन भाषितो विश्वसम्पदे ॥ ४ ॥ वायविडंग २ पल, शुद्ध विष १ पल, लोहभस्म आधापल, शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गंधक १ तोला इन सबको एकत्र पीसकर बकरीके दूधमें खरल कर सोलह सोलह रत्तीकी गोली बना लेवे और